मंगलवार, 1 सितंबर 2020

एक व्यंग्य 61: एक पत्र -कविता चोर के नाम

एक व्यंग्य : एक पत्र 
कविता- चोर के नाम 

हे मेरे कविता प्रेमी !

सादर चरण स्पर्श

अत्र कुशलम ! तत्रास्तु ?आशा करता हूं कि आप ’चुल्लू भर पानी’ ढूँढ रहे होंगे ।

सुबह ही सुबह ,जब मेरे मित्रों ने ’ब्रेकिंग न्यूज़ ’ शैली में यह ख़बर सुनाई की मेरी एक कविता
फिर चोरी हो गई तो मेरा मन अति प्रफ़्फ़ुलित हो गया । अब मेरी कविता गीत ग़ज़ल ’चोरी’ होने के योग्य
हो गई ।बड़ी हो गईं। चोरों की नज़रों में चढ़ गई और मैं स्वयं अपनी नज़रों चढ़ गया। मेरी वह कविता चोरी कर के आप ने उसे अमर कर दिया ।

ना "ब्लाग" की सीमा हो, ना ’व्हाट्स अप" का बन्धन
मेरे गीत चुरा लेना , जब चाहे तेरा मन 

मेरे गीत चुरा कर तुम --मेरे गीत अमर कर दो
इस चोरा-चोरी की, सखे! रीति अमर कर दो 

सुबह से ही फ़ोन की घंटियाँ टनटना रही है । मित्रों की उत्सुकता है। जानना चाह्ते है कि कौन सी वह  कविता थी
जिसे ’चुरा’ कर आप ने अमरत्व प्रदान कर दिया । वे सब इस अदा से पूछ रहें कि हाय ! वो गीत उन्होने  क्यों न चुराया ।

हे प्रियवर !
तुझे  सूरज कहूँ या चन्दा ,तुझे दीप कहूँ  या तारा
मेरा नाम करेगा रौशन ,तू गीत चुरा के दुबारा

मैं कब से तरस रहा था --मेरा गीत  चुरा ले कोई--

माफ़ करना मित्र ! मारे खुशी के, मैं क्षण भर के लिए विषय पथ से भटक गया ।
आप को सूरज-चन्दा क्या कहूँ। और भी बहुत से शब्द हैं आप के लिए --चोर --चोरकट-- उच्चक्का
-चाईं--गिरहकट--उठाईगीर- --पाकेटमार--जेबकतरा--चोर -महाचोर--।किस पद्म श्री से विभूषित करूँ, महराज!
डकैत इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि डकैतों के सम्मान में  गुस्ताखी हो जायेगी।और ’लुच्च्चा,लफ़ंगा,आवारा--दूसरी श्रेणी के शब्द हैं।

चाईं तो आप समझते होंगे ? नहीं ? तो मुगल सराय जंक्शन पर ऐसे बहुत से मिल जायेंगे कहते हुए
"सौ चाईं --एक मुगलसराई"
कभी पाला नहीं पड़ा । बस सुना ही सुना है ।

हे मित्र प्रवर !
आप स्वयं पर शर्मिन्दा न हों ।
बहुत से लोग ऐसा काम करते रहते हैं। कोई दिल चुराता है ,कोई नज़र चुराता है, कोई "टैक्स’ चुराता है।
राजकुमार जी तो खुली आँखों से ’सुर्मा"  चुरा लेते थे ।
मेरा तो एक ’दिल चुरा" के ले गई सो आज तक लौटाई ही नहीं।
" कहते हो न देंगे हम दिल अगर पड़ा पाया "--अच्छा है ,मत देना ,मगर मेरा दिल किसी और को न दे देना।
इक तुम ही नहीं तनहा चोरी में मेरे रुस्वा
तुम जैसे यहाँ  मंचो पर चोर हज़ारों हैं

मैं भी ऐसा ही चोर कर्म करता रहता हूँ यदा-कदा । किसी के-ग़ज़ल की ज़मीन चुरा लेता हूँ। भाव चुरा लेता हूँ ।
भावना चुरा लेता हूं।किसी की कल्पना चुरा लेता हूँ ।कभी कभी 1-2 मिसरा भी चुरा लेता हूँ ।
 परन्तु मैं इसे चोरी का नहीं, ’प्रेरणा’ का नाम देता हूँ।,
एक सलाह है आप को। आप यह " चोर-कर्म ’ शौक से करें परन्तु 1-2 शब्द ज़रा इधर उधर ज़रूर कर दें
1-2 रदीफ़-क़ाफ़िया ही बदल दें । अरे नहीं नहीं --रदीफ़ नहीं बदलना भाई मेरे--रंगे हाथ पकड़े जाओगे।
एकाध मिसरा ऊपर नीचे कर दें । हू-ब-हू न उतारें । फिर आप का कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता ।
 तन कर खड़े हो सकते हो।ग्लानि-मुक्त हो सकते हैं।

न हारा हूँ मैं  - न तुम ही थके हो 
मैं तो हूँ कच्चा --तुम तो पके हो

अगले पत्र में आप को”चौर्य कर्म ’के और भी गुर सिखा सकते है ।
एक मंच भी बना सकते हैं -जैसे बड़े बड़े शहरों में -एक ’चोर बाज़ार ’ होता है । चोर-हटिया होता है ।

हे मेरे शुभ चिन्तक !
मुझे आजतक यह बात समझ में न आई कि लोग गीत, ग़ज़ल, माहिया ही क्यों चुराते हैं? कहानी, उपन्यास  क्यॊं
नही चुराते? इस प्रश्न का उत्तर लौटती डाक से अवश्य दीजियेगा।

इस कविता चोरी पर मेरे कुछ मित्रॊ ने अयाचित सलाह दी कि मैंअविलम्ब  इस चोरी की रिपोर्ट किसी थाने में
करूँ।मैने किया था एक बार वह भी  । । यह एक अलग किस्सा है । अब लौं नसानी ,अब ना नसइहों। अगले किसी पत्र
में इसकी चर्चा करूँगा । किसी ने सलाह दी कि अपनी ग़ज़ल में ”तख़ल्लुस’ का ताला लगा दो । मैने वह भी किया।
आप के हुनर के आगे मेरा हुनर कुछ काम न आया।

मित्रवर !
एक श्रीमान ने तो मेरा तख़ल्लुस हटा कर अपना ’तख़ल्लुस’ डाल दिया ।वह शख़्स पूर्व जनम में ज़रूर शायर रहा होगा । उसने  अपना तख़ल्लुस इस सफ़ाई
से डाला ’हम वज़न ’ हम क़ाफ़िया ’ बा-बह्र , बना कर डाला  वल्लाह क्या कहने  कि  एक बार तो हम भी अपनी ग़ज़ल को उसका ही ग़ज़ल समझ बैठे ।
वाह वाह कर बैठे। दाद दे बैठे ।ख़ुदा उसके इस ’हुनर’ को  और बुलन्दी अता करे।

मेरी एक मित्राणी  [ महिला मित्र ] ने सलाह दी  कि मै  अपनी ग़ज़ल में ऐसी भयंकर ग़लती कर के डाल दूँ  कि वैसी ग़लती बड़े से बड़ा शायर  भी न कर सके।
वह ग़लती ही आप का ’सिगनेचर स्टेट्मेन्ट" होगी और चोरी तुरन्त पकड़ी जायेगी ।श्रीमन! मैने  वह भी किया । मगर ’अली बाबा चालीस चोर ’ शैली में सभी ने
अपनी अपनी  ग़ज़ल में वैसी ही ग़लतियाँ डालनी  शुरु कर दी । मेरी रचना चोरी होने से वंचित तो हो गई पर मै उस सुख से वंचित हो गया जो चोरी होने के बाद
मुझे मिलता था । वही सुख -वही आनन्द --तुम्हें सूरज कहूँ या चंदा -वा्ला  सुख -।
उन महिला मित्र ने सबको यही सलाह दी और सभी ने माना। कारण-सभी शादी-शुदा थे ।

किसी मित्र ने सलाह दिया कि तुम अपनी रचना के अन्त में "अपनी स्वरचित रचना" लिख दो। कोई माई का लाल नहीं चुरा पायेगा ।
तो हे मेरे काव्य प्रिये ! तुम भी तो किसी माई के लाल ही होगे ?
अब तो बहुत से लोग अपनी रचना के नीचे ’ कापी राइट -फ़लाना सिंह ’ लिख देते हैं । हा हा हा । वो अज्ञानी है । मूढ़ हैं।
आप जैसे खानदानी चोर के लिए  इन छोटे-मोटे तालों की क्या औक़ात !
आप के इस " चौर्य कर्म " में आप का ’शौर्य’ झलकता है -जैसे आप कह रहे हों --हाँ मैने चुराया है --क्या कर लोगे ?
प्रभु ! मैं एक दीनहीन  कवि क्या कर सकता हूँ । आप ने यशोधरा को नहीं पढ़ा

  हाँ तुम मुझ से कह ,ले जाते 
तो क्या अपने चोर-कर्म में मुझको बाधा पाते ?
 हाय !तुम मुझ से कह  ले जाते 

हे मित्रवर !
अगर आप कहते तो आप के श्री चरणॊ में ऐसे ही 2-4 गीत  ऐसे ही  समर्पित कर देता  -फ़्री में । कम से कम यह पाप तो आप को नहीं करना पड़ता।
"फ़्री में"- इसलिए कि मेरे एक साहित्यिक मित्र बता रहे थे कि उनके पास किसी का [ महिला या पुरुष ,नहीं बताया ] एक ऐसा प्रस्ताव आया था कि वह अपनी रचनाएँ
उन्हे देते जाएँ -और उनसे धन लेते जाए । धनोपार्जन का अच्छा साधन हो जायेगा ।
पता नहीं इसमें कितनी सत्यता थी  --मगर अन्त में  उन्होनें जो बताया वह बिल्कुल सत्य था।

उन्होने बड़े दर्द भरे स्वर में बताया ---पाठक जी -जानते हैं -मैं बिक सकता हूँ , मेरी ’क़लम’ नहीं बिक सकती ।
फिर मैने उनकी क़लम को प्रणाम किया।

तो हे मित्र !
यह पत्र अब लम्बा हो चला है और आप को भी जम्हाई आ रही होगी रात में "सत्कर्म" करते करते थक जो गए होंगे।
"ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता। ख़ैर।कभी साक्षात मिलेंगे तो चरण वन्दना भी कर लूँगा
अपने अन्य साथियों को मेरा प्रणाम कहिएगा ।अगले पत्र में अन्य  बातों पर मिल कर विस्तार से चर्चा करेंगे।
 । भगवान आप के ’ हुनर’ को यूँ ही ज़िन्दा रखे।

उत्तर की प्रतीक्षा में

भवदीय

-आनन्द.पाठक-

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