रविवार, 4 अक्तूबर 2020

एक व्यंग्य 65 : --... बैठ निठल्लम

एक व्यंग्य 65 ----बैठ निठल्लम

कर तू चिन्तन ,अर्ध: सुप्तम्
अल्लम्  गल्लम् बैठ निठल्लम्
काम करेगा मूर्ख: गर्दभ
भज आनन्दम्  ..भज आनन्दम्

 अर्थात हे सरकारी सेवा के नश्वर प्राणी !--- अब इस श्लोक का अर्थ क्या बताना !
सरकारी भाषा में इसे ’सेल्फ़-एक्सप्लेनटरी"कहते है । सामान्य भाषा में इसे ’स्वयं सिद्ध ’तथ्य कहते हैं
यह सरकारी ’गायत्री मन्त्र" , सरकारी सेवा  ’ज्वाइन’ करने के एक सप्ताह के अन्दर ही एक मिश्रा जी ने दिया था।
मिश्रा जी उन दिनों  ’कर्मचारी यूनियन’ के अध्यक्ष हुआ करते थे और उन्होने मुझे इसी मन्त्र से ’दीक्षित’ किया था और मुझे यूनियन का सदस्य बना लिया था ।
 
 मिश्रा जी को इतनी ही ’संस्कॄत’ आती थी और इतना ही ’अभिमन्त्रित’ किया था । इस श्लोक की ’एक-सूत्रीय ’भाष्य यह है कि सरकारी सेवा में 
--बने रहो पगला--काम करेगा अगला --
बाक़ी आप स्वयं समझदार हैं।
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और मैं ?
मैं किसी दीक्षित शिष्य की तरह  सरकारी सेवा में आजीवन इस मन्त्र का जाप करता रहा और सुखी सम्पन्न बेदाग़ रिटायर हो गया।
बेदाग़  रिटायर तो  होना ही था । दाग़ तो उनपर लगते है जो काम करते हैं ।हम निठल्लों पर क्या दाग़ !
 - मिर्ज़ा अज़ीम बेग 'अज़ीम' साहब पहले ही फ़र्मा गए हैं
गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में
वो तिफ़्ल क्या गिरेगा जो घुटनों के बल चले
  [तिफ़्ल= बच्चा]
इसीलिए मैं कभी शहसवार बना ही नहीं । सवारी की ही नहीं। नौकरी में हमेशा किसी न किसी ’गाड-फ़ादर’ की ऊँगली पकड़ कर ही चला ।अपने पैर पर चला ही नहीं तो गिरता क्या ,दाग़ लगता क्या !
मेरे ’निठल्लेपन’ को सारा आफ़िस जानता था । मीर तक़ी ’मीर’ साहब मेरे लिए एक तर्मीमशुदा शे’र बहुत पहले ही  लिख कर छोड़ गए थे कि भविष्य में कि आनन्द मियां के काम आएगा—
  
पत्ता पत्ता  बूटा बूटा  हाल हमारा जाने है
जाने न जाने ’साहिब’ न जाने
,’आफ़िस’ सारा जाने है
 
यानी सारा आफ़िस मेरी क्षमता जानता था,बस ’बड़ा साहब’ ही नहीं जानता था।
 
मिश्रा जी के "भज आनन्दम -भज आनन्दम -सूक्त -को  मैं आजतक नहीं समझ पाया। उन्होने  मेरा नाम लेकर मुझे अभिमन्त्रित किया था या  ’आनन्द-पूर्वक’ रहने की कामना की थी
ख़ैर ,दो-चार महीने बाद पता चला कि मुझसे पहले ,वह अन्य कई कर्मचारियों को  इसी तरह सिखा-पढ़ा कर अपने यूनियन का सदस्य बना चुके थे ।
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       पटना में ,एक सज्जन थे।निठल्ले नहीं थे । भगवा धारी थे।,चन्दन-टीका लगाते थे। एक हाथ में कमण्डलनुमा  कोई चीज़ लेकर चलते थे जिसमें वह गंगाजल [कहते तो वह यही थे] रखते थे और दूसरे हाथ में  शंख । 
सरकारी नौकर थे। उस समय ’बायोमैट्रिक अटेन्डेस’ का तरीका इज़ाद नहीं हुआ था। सो वह 11-12 बजे ही आफ़िस आते थे ।
सरकारी नौकर थे। उस समय ’बायोमैट्रिक अटेन्डेस’ का तरीका इज़ाद नहीं हुआ था। सो वह 11-12 बजे ही आफ़िस आते थे ।
कार्यालय में उनकी उपस्थिति का प्रमाण ,टेबल पर रखा  उनका ’कोट’ और उनका ’चश्मा’ देता था।
आफ़िस मे घुसते ही जोर से अपना ’शंख’ बजाते थे और हर कमरे में घुस-घुस कर अपना तथाकथित ’गंगाजल’ छिड़कते थे ।उनका विश्वास था
 अजगर करे न चाकरी ,पंछी करे न काम
दास मलूका कह गए
,सबके दाता  राम
 कहते थे काम ही करना होता तो सरकारी नौकरी क्यों करता ?
 
उनके डाइरेक्टर ,उन्हें एक लाइलाज मर्ज़ समझते थे । वह उस सज्जन को कुछ नहीं बोलते थे।बाद में जब एक दूसरे नए नए एक डाइरेक्टर आए तो उन्होने इन महाशय को तलब किया और डाँट लगाई--
’ये क्या गन्ध मचा रखी है’-? एक तो देर से  आते हो ,ऊपर से शंख बजा कर सब को ’डिस्टर्ब’ करते हो--
’जी हाँ ,मैं शंख बजाता हूँ’-आप को कोई ’प्राब्लम’? उन महाशय ने पोरस की तरह निर्भीक उत्तर दिया--’ सोए हुए को जगाता हूँ-जो भ्रष्ट हैं--उन्हें गंगाजल से शुद्ध करता हूँ।
यहाँ भी शंख बजाऊँ क्या? अभी आप नए नए आए हो --गंगाजल बाद में छिड़कूँगा।
डाइरेक्टर साहब  ज़ोर से चीखे---’गेट-आउट" ।
और वो सज्जन बाहर आ गए।
वह सज्जन तो नहीं सुधरे--लाइलाज मर्ज़  थे। डाइरेक्टर साहब ही सुधर गए ।
 वह सज्जन मेरे आदर्श बन गए-। वह मेरे ’मीर’ बन गए -कारण कि वह मुझसे से भी बड़े निठ्ल्ले थे।बक़ौल ग़ालिब
 "रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ’ग़ालिब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ’मीर’ भी था
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ऐसे ही एक सज्जन और थे ।विभाग में मुख्य महाप्रबन्धक थे । मगर ज़रा औरों से हट कर थे। केश-विहीन थे।चाहें तो  टकला भी कह सकते हैं -आप । पूर्व जनम में ’अंग्रेजों के ज़माने के जेलर’ ज़रूर रहें होंगे। ।उनको  विश्वास था कि इस विभाग को वही सँभाले हुए हैं। रात में भी  टिटिहरी की भाँति टाँग ऊपर उठा कर सोते थे --कहीं आसमान गिर गया तो----?
       उनकी धारणा थी कि सारे अधीनस्थ कर्मचारी ,अधिकारी साले बहानेबाज होते हैं  ,चोर होते हैं ,कामचोर होते हैं  ।वही एक हैं जो हरिश्चन्द्र की परम्परा को को अबतक जीवित रखे हुए हैं । ऐसे लोग
कंठी माला ,तुलसीदल ,गंगाजल साथ में लेकर चलते हैं और वक्त ज़रूरत गधे को भी बाप बना लेते हैं।
वह किसी अन्य सर्किल से ट्रांसफ़र हो कर इस सर्किल में आ रहे थे ।उनका अक़ीदा था
 
हम तालिब-ए-शोहरत है हमें नंग से क्या काम
बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा
?
                    -शेफ़्ता-
 उर्दू में ’नंग’ का अर्थ होता है लाज,शर्म,हया।
अर्थ इसलिए लिख दिया कि आप लोग उनके नाम के  साथ कहीं ’नंग’ का अर्थ ’नंगा’ न समझ लें| वह थे या नहीं थे ,कह नहीं सकता ।लगता है, रहे ही होंगे। 
 
 आने वाले यह महाशय भी खुश और जहाँ से आ रहे थे  वहाँ के लोग भी  खुश-।इन सज्जन की विदाई के बाद वहाँ की प्रजा नाच गा रही थी ।खुशिया मना रही थी । दोनो खुश । इन साहब को  खुशी यह कि उन कामचोरों निठ्ल्लों से निज़ात मिली। स्टाफ़ खुश इसलिए कि जान बची ,’सर्किल’ डूबने से बच गया ।हालाँकि यह अपनी समझ से  डुबा कर ही आये थे।
मगर , यहाँ की ,नई सर्किल वाली जनता दुखी।आने वाले अजाब से दुखी ।बड़ा खुर्राट है -खूसट है -कभी हँसता ही नहीं ।,चेहरे पर  रौनक ही नहीं ,बस खोपड़ी  चमकती है उसकी । उनके आने से पहले ही ,उनकी शोहरत यहाँ आ गई थी  । आने वाले यह साहब मन ही मन खुश । अपनी ’शोहरत-पर खुश थे।
 मैं इसे शोहरत कहूँ या अपनी रुसवाई कहूँ
मुझसे पहले उस गली मे
, मेरे अफ़साने गए
             -ख़ातिर ग़ज़नवी-
        इन महोदय की एक धारणा यह थी कि बिल्ली मारनी है तो पहली रात मारनी है। बाद में मारने से कोई फ़ायदा नहीं । अधीनस्थों को हड़का के रखो ।,दबा के रखो।,गरिया के रख्खो । लतिया के रख्खो । अत: ज्वाइन करने के एक घंटे के अन्दर ही सभी अधिकारियों की एक मीटिंग बुला ली।
न अरिचय,न परिचय -न देखा न सुनी , न  बातचीत।  -सीधे मीटिंग ।बिल्ली इसी एक घंटे में मारनी है----शुरू हो गए--सभी अधिकारियों को संबोधित करने लग गए -आप नल्ले है---आप निठ्ल्ले हैं---आप ब्लफ़ मार रहे है -आप झूट बोल रहे हैं -आप काहिल हैं -आप नालायक है -आप कोढिया हैं -आप लोग तो भजिया तलने के भी क़ाबिल नहीं ----"
 जनाब शौक़त साहब ने सही फ़र्माया था
  तुम्हारी शान घट जाती कि रुतबा घट गया होता
जो गुस्से से कहा तुमने
,वही हँस कर कहा  होता
 मगर इन टकले महोदय को कहाँ समझ आता । केशविहीन खोपडी से फिसल गया होगा ।
 उनकी शान में मैने भी एक शे’र मन ही मन [अप्रत्यक्ष ] गुनगुनाया।
 ये शराफ़त थी हमारी ,आप की सुन गालियां
चाहते हम भी सुनाते ,बेज़ुबां हम भी न थे
 ख़ैर वह भी चले गए अपना दिन काट कर। ट्रान्सफ़र हो कर ।मुख्यालय को यही बताते रहे कि उन्होने  सर्किल को डूबने से बचा लिया । कितना बचाए---खुदा जाने ।
 अब  तो वह भी रिटायर हो चुके  होंगे । कहीं  किसी सब्ज़ीवाले को ’भजिया तलने का तरीक़ा’ बता रहे होंगे।
अकबर इलाहाबादी का एक शे’र]
हम क्या कहें अहबाब क्या ,कार-ए-नुमायां हो गए
बी0ए0 हुए
,नौकर हुए, पेंशन मिली फिर  मर गए
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       एक सज्जन और थे । वह भी  सरकारी  सेवा में थे।  निठल्ले  तो नहीं थे। काम करते थे ।पर सरकारी काम में उनका योगदान किसी निठ्ल्ले के काम से ज़्यादा नहीं था ।
 वह ’गणेश-परिक्रमा’ में विश्वास करते थे। कुछ दिलजले उन्हें चमचा कहते थे और इस क्रिया को ’चमचागिरी ’ कहते थे  ।जो ऐसा कहते थे वो अज्ञानी थे।
सरकारी सेवा में ’गणेश -परिक्रमा’  और ’नवनीत-लेपन ’[ बटरिंग कह सकते हैं ] का बड़ा महत्व होता है ।यह  सबके वश की बात नहीं । जिसमें यह नैसर्गिक गुण होता है वही कर सकता है ।बड़ा अनुभव का, काम होता है ।बड़ा महीन  काम होता है यह ।हम-आप करेंगे तो फ़ूहड़ जैसा करेंगे । जो यह परिक्रमा नहीं कर सकते ,वो आफ़िस में  गधे की तरह कार्य बोझ से आजीवन अभिशप्त रहते हैं । इन ’परिक्रमार्थियों’ की पहुँच बड़े साहब के ’किचन’ तक होती है ।वे जानते हैं कि बड़ा साहब,  आफ़िस में चाहे जितना खुर्राट हो ,जितना भी शेर बहादुर हो ,कन्ट्रोल ’किचन’ से ही होता है .रिमोट भाभी जी के ही हाथ में रहता है ।इसीलिए कभी गोभी ,कभी सब्ज़ी,कभी मिठाई ,कभी रस-मलाई लेकर सदैव सेवारत रहते थे भाभी जी की सेवा में । भाभी जी भी इनकी उपयोगिता समझती थीं । कभी किसी ’किटी-पार्टी’ के लिए होटल में टेबल बुक करवाना  हो ,बच्चों को बाज़ार घुमवाना हो , सहेलियों के लिए सेनेमा टिकट मँगवाना हो ,तो भाई साहब हाज़िर ।
       बड़े साहब की नज़रों में भी यह बडे काम के आदमी थे । बड़े साहब का कोई बड़ा साहब, रिश्तेदार, मित्र आ रहा होता है तो वह भी इन्हीं का ’हनुमत-स्मरण ’ करते थे । एयरपोर्ट से किसी को रिसीव करना हो--होटल की व्यवस्था करवानी हो, रेलवे का टिकट निकलवाना हो , फ़्लाइट का रिजर्वेशन करवाना हो,डाक्टर से अप्वाइन्ट्मेन्ट लेना हो ,  गाड़ी का इन्तज़ाम करना हो तो भाई साहब आगे। यह भाई साहब , ऐसे  काम बड़े उत्साह से बड़े प्रेम से ,बड़े मनोयोग से करते थे ।उनसे अगर कुछ नहीं होता था  तो विभागीय काम जिसकी वह तनख़्वाह लेते थे ।कौन कहता है कि ऐसे लोग  निठ्ल्ले  होते हैं । ऐसे लोग बड़े सुखी-सम्पन्न होते है। साल-ओ-साल अच्छे गोपनीय रिपोर्ट लिखवा लेते हैं । और जो यह सब कार्य नहीं कर पाते हैं वह सुबह-शाम कोल्हू के बैल बने रहते हैं
 जो यह विद्या नहीं पढ़ा ,सो पाछे पछताय
आफ़िस में गदहा बने
,लादि लादि मर जाय
 बचपन में यह दोहा पढ़ा था। ऐसा ही कुछ पढ़ा था -आजतक याद है ।
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अब मैं ’रिटायर’ हो गया ।
अब मैं विभागीय हित के बारे में चिन्तन नहीं करता । समस्त सेवा-काल, विभाग का ही चिन्तन करता रहा। बहुत कर लिया।
अब मैं ’देश-हित’ के बारे में चिन्तन करता हूँ [ग़ालिब साहब से क्षमा याचना सहित ।
 बक़द्रे-शौक़ नहीं ,ज़र्फ़-ए-तंगनाए ख़याल
कुछ और चाहिए वसुअत मेरे ’चिन्तन’ के लिए
         
तात्पर्य यह कि विभागीय हित का  चिन्तन – अब मुझे चिन्तन की गली अब तंग लगती है । मेरे चिन्तन को अब विस्तृत क्षेत्र चाहिए, विस्तार चाहिए ,वसुअत चाहिए  । अब मैं पूरे देश के हित का चिन्तन करता हूँ ।
आज़ादी के बाद भी लोगों को आज़ादी चाहिए। किससे आज़ादी चाहिए।कहते हैं ---हर साँस है माँगे--- आज़ादी। हम छीन के लेंगे ---आज़ादी ।हम पीट के लेंगे आज़ादी । हम खींच के लेंगे आज़ादी ।भारत तेरे टुकड़े  होंगे –इन्शा अल्लाह ,इन्शा अल्लाह ।
भईए ! बोलने की इतनी आज़ादी मिली है तभी तो तुम बोल रहे हों । ,छुट्टा खुल्ला मे घूम रहे हो देश के कोने कोने में । आजकल ऐसे नारे लगाना ,फ़ैशन हो गया है ।’सिगनेचर-स्टेटमेन्ट ’ हो गया है ।इससे अपना कद बढ़ता है ,अपनी माँग बढ़ती है ।मीडिया पे छा जाते है ।
चुनाव का टिकट मिल जाता है । सेमिनार में बुलाए जाने लगते हैं ।आने-जाने का ’एयर टिकट’ फ़्री ।
 
देश किधर जा रहा है ।किसी को चिन्ता नहीं ।सभी लोग अपने अपने अधिकार की बात कर रहे हैं ।यह मेरा संवैधानिक अधिकार है ,वह उनका संवैधानिक अधिकार है ।, ’कर्तव्य’ की बात कोई नहीं करता - देश के प्रति उनका कर्तव्य है-- कोई चिन्ता नहीं । मैं चिन्तन कर रहा हूँ। चिन्तन किए जा रहा हूँ।
इधर ’शाहीन बाग ’ उधर ’शाहीन बाग ’ । प्रधान मन्त्री ने ठीक ही कहा था -’यह संयोग नहीं ,प्रयोग है ।  हर शहर में शाहीन बाग। दिल्ली का शाहीन बाग अलग।अलीगढ़ का शाहीन बाग अलग ।
बनारस का शाहीन बाग अलग॥--लखनऊ का शाहीन बाग अलग --। कितने कितने शाहीन बाग । अच्छा हुआ पता लग गया कि दीमक कहाँ कहाँ लगा हुआ है ।
 
जब खुली आँख से चिन्तन करता हूँ तो लोग कहते है कि खुली आँख से सपने देख रहा हूँ । अब आंखें बन्द कर चिन्तन करता हूँ ।यह चिन्तनावस्था की उच्च श्रेणी  है।--- देश किधर
जा रहा है ---कुछ लोग ईंट के टुकड़े इकट्ठा कर रहे हैं अपनी अपनी छतों  पर--खाली बोतलें इकट्ठा कर रहें है --बोतलों में ’एसिड’’ भरी जा रही है -हिंसा  फ़ैलाने में काम आएगा -और कितने टुकड़ें होंगे देश के ।कोई कहता है ’कर्नाटक माँगे आज़ादी---आसाम भी  माँगे आज़ादी---कश्मीर भी माँगे आज़ादी ---।नारा सार्वभौम है -बस राज्य के नाम जोड़ते जाइए --आज़ादी--आज़ादी --अलाना माँगे आज़ादी--फ़लाना माँगे आज़ादी--
 
 अच्छा ।
इसी प्रसंग पर एक घटना  याद आ गई ।पूर्वांचल के एक शादी समारोह में कुछ महिलायें  लोक गीत गा रही थी –बोल थे--हम तो -
 
    --"अपने सैयाँ से ’साइकिल " मँगईबो--हमार कोई का करिहैं --
    उसी साईकिल से बाजार जईबो --- हमार कोई का करिहैं--
 
  10- मिनट तक यह लोकगीत ऐसे ही चलता रहा --बस ’साइकिल’ की जगह --कोई  महिला स्कूटर जोड़ देती ,कोई महिला मोटर साइकिल  जोड़ देती ..कोई  महिला ’कार’ जोड़ देती ---और यह  जोड़ने का सिलसिला यहाँ तक पहुँचा   कि एक  महिला ने तो ’बोईंग’ मँगईबो’  जोड़ दी ।
अपने सैया से ’बोईंग ’ मगईबों हमार कोई का करिहैं
 वह महिला कुछ पढ़ी लिखी थी । दूसरी महिला उससे कुछ ज़्यादे पढ़ी-लिखी थी जब उसने यह गाया -अपने सैय़ाँ से "एयर फ़ोर्स वन’ मँगईबो---तो ’ट्रम्प’ साहब घबरा गए।
 
       मैं नहीं घबराया । मैं जानता था कि होना-जाना कुछ नहीं है ।बस ’मुख-सुख’ है । कुछ  लोग गा रहे हैं ,,बाक़ी लोग सुन रहे है -लोग आनन्द उठा रहे हैं । कुछ लोग ’-आज़ादी माँगने’ के नारे लगा रहे हैं ’उनका अपना आनन्द है ’ है --बाक़ी लोग तालियाँ बजा रहे हैं-उनका अपना आनन्द हैं।किसी को नारा लगाने की आज़ादी है तो किसी को आनन्द उठाने की आज़ादी है।सबको बोलने की आज़ादी है--। कोई यह नहीं कहता--गरीबी से चाहिए आज़ादी--मंहगाई से चाहिए आज़ादी--बेरोजगारी से चाहिए आज़ादी । वे जानते हैं कि ये सब नारे घिस चुके हैं--ऐसे नारों पर मीडिया फ़ोकस नहीं करती ।
जब मीडिया ही फ़ोकस न करें तो नारा लगाने का फ़ायदा क्या--?
मैं चिन्तन की परम अवस्था में पहुँच ही रहा  था .कि - अचानक एक कर्कश आवाज़ उभरी ----"हे चिन्तनेश्वर महादेव !  माटी के माधो ! चिन्तन-फिन्तन खत्म हो चुका हो तो उधर ’किचन’ में आइए-- मटर छीलिए--प्याज काटिए--लहसुन छीलिए---"---देखा तो श्रीमती जी हैं।
 चिन्तन भंग हो गया।-
--"यह कमज़र्फ़ कमबख़्त  औरत ,अपने ’किचन-चिन्तन’ से कभी  बाहर नहीं निकल सकती " लगता है किचन ही इसका देश है ---मैने  मनोगत कहा। प्रत्यक्ष कहने के खतरे से आप सभी शादी-शुदा अवश्य परिचित होंगे ।
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आप  चिन्ता न करें । कल --वैश्विक चिन्तन करूँगा--बैठ निठल्लम  ।ग्लोबल वार्मिंग पर  करूँगा ---,पर्यावरण पर करूँगा ----प्रदूषण पर करूँगा---निरस्त्रीकरण पर करूँगा--ओज़ोन लेयर पर करूँगा जैविक हथियार पर करूगा -हिन्द महासागर पर करूँगा--प्रशान्त महासागर पर करूँगा---
और हम ?
बाद में -- फ़ारिग़ बुखारी- साहब ने बता दिया है ।
 याद आएँगे ज़माने को मिसालों के लिए
जैसे बोसीदा किताबें हों हवालों के लिए
[बोसीदा = सड़ी-गली ,जीर्ण-शीर्ण ]
 अस्तु

 

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