मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

एक व्यंग्य 68 : साहित्यिक खोमचा

 

                         एक व्यंग्य :साहित्यिक  खोमचा

 

"यार मिश्रा ! सोच रहा हूँ ,एक खोमचा मैं भी लगा लूँ ’

’खोsssमचा ?? क्या ?क्या ? क्यों?’-अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी ? -मिश्रा जी अचानक मेरे इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चौंक गए -"पेन्शन बन्द हो गई क्या?’ खोमचा किसका ? दही-भल्ले का?, ’चनाजोर गरम का"?

 साहित्य का ,’साहित्यिक खोमचा ’- ।मैने समझाया-"रिटायर होने के बाद खाली बैठा था सोचा टाइम पास हो जायेगा और हिन्दी की कुछ सेवा भी हो जाएगी ।

आम का आम गुठलियों का दा्म भी हो जायेगा । -

 

-गुठलियों का दाम ?? अच्छा तो हिन्दी की सेवा में भी ’दाम ’?  व्यापार  ?-मिश्राजी ने कहा-’ वैसे ही कम लोग हैं क्या हिंदी के सेवा करने को ,जो अब तुम चले हो।

ग्राहक कहाँ मिलेंगे ? पानी-पूरी के ,भेल पूरी के  तो शायद मिल भी जाय । साहित्यिक  ’खोमचे’ के लिए कहाँ मिलेंगे ?

-मिलेंगे मिश्रा  ,,खूब मिलेंगे ! फ़ेसबुक,व्हाटसअप  पर हर दिन कोई न कोई मंच ,महफ़िल ,ग्रुप बना रहा है । कभी कविता के नाम पर ,कभी ग़ज़ल के नाम पर ,कभी अदब के नाम पर ,कभी साहित्य के नाम पर ।

 मेरे उस्ताद ने कहा था  बेटा ! तू जहाँ भी खोमचा लगा देगा ,वहीं 2-4-10 ग्राहक मिल जायेंगे।

फ़ेसबुक पर ,ह्वाट्स पर,ट्विटर पर ,ब्लाग पर  हर दूसरा आदमी ग़ज़ल कह रहा है , शायरी कर रहा है ,दोहा लिख रहा है ,सबको ’चाट’ की तलब है,छपने की ललक है।लिखने की ठनक है।

  वाह वाह सुनने की ठसक है। मैं भी फ़ेसबुक पर ,’व्हाट्स ’ पर एक मंच बनाऊँगा ।

 

-तो उससे क्या होगा ?

हिन्दी की सेवा होगी और क्या ? ग्रुप और  मंच बनाने में कौन सा पैसा लगता है । मैं ’ऎडमिन’ बन जाऊँगा बैठे बैठाए ।शान-ओ-शौकत ऊपर से । न हर्रे लगे न फिटकरी, रंग  बने  चोखा ।

-तो उससे क्या होगा ?

हिन्दी की सेवा होगी और क्या ? जिसको चाहे ग्रुप में जोड़ लो --जिसको चाहे ग्रुप से लतिया दो --आत्मसुख मिलता है । जिसको चाहे सम्मनित कर दो , जिसकी

चाहे टाँग खिंचाई कर लो --

-तो उससे क्या होगा ?

हिंदी की सेवा होगी और क्या । जिसको चाहे  उसको ’वरिष्ठ कवि’ कह दो --अज़ीमुश्शान शायर कह दो ।उत्साहवर्धन के नाम पर सबके कलाम को वाह वाह करते रहो । उम्दा कलाम ।

लाजवाब कविता । यह सब करने का समय न मिले तो एक ही झाड़ू से -सबका कलाम उम्दा’- कर दो जैसे पंडित लोग एक ही मन्त्र से -" सर्व देवेभ्यो नम: स्वाहा - कर देते हैं।  अपने सदस्यों का सम्मान  करूँगा  तो  ग्रुप का सम्मान होगा। ग्राहक भागेंगे नहीं ।

उनकी पुस्तकों का विमोचन करवाएँगे -- सहयोग राशि लेकर साझा-संग्रह प्रकाशित करवाएँगे--सम्मान समारोह करवाएँगे- ग़ज़ल सम्राट की उपाधि देंगे--काव्य चेतना शिरोमणि पुरस्कार देंगे---हिंदी सेवा का प्रमाण-पत्र बेंचेंगे -दो-चार पैसे  तो बच ही जाएँगे ।

-अच्छा ! तो आप इसी गुठलियों के दाम की बात कर रहे थे ? तो  हिंदी की सेवा ?? ऎसे मंचों पर किसी को भाषा की शुद्धता की चिन्ता नहीं ।,वर्तनी का खयाल नहीं

वाक्य विन्यास पर ध्यान नहीं । जो बोल दिया वही हिंदी, जो लिख दिया वही साहित्य । छपने की प्यास है। सभी जल्दी में है ।-मिश्रा जी ने अपनी व्यथा उड़ेली

 

भई मिश्रा !पहले दाम फिर काम । हिंदी की सेवा तो भारत सरकार कर रही है न पिछले 65-70 साल से । 14-सितम्बर है न इस काम के  लिए।हाथी के पाँव में सबका पाँव।

भई पाठक ! एक सलाह दूँ ? हिंदी पर बड़ी कृपा होगी -मिश्रा जी ने कहा

हाँ हाँ !-मैने चहकते हुए कहा-"कहो मित्रवर !कहो ! नि:संकोच कहो !

-तुम तो बस  खोपचे में एक खोमचा लगा ही लो । हिंदी सेवा  का नही , ’चनाजोर’ गरम का ।गाते हुए बेचोगे तो  ज़्यादा बिक्री होगी ज़्यादा फ़ायदा होगा।

 

चनाजोर गरम बाबू मैं लाया मजेदार -चना जोर गरम

मेरा चना बना है आला

मैने डाला गरम मसाला

मेरा चना बना चुटकुल्ला

जिसको खाए हाजी मुल्ला--चना जोर गरम ।

 

इससे पहले कि मैं अपनी "चरण-पादुका " ढूँढता , उससे पहले ही मिश्रा जी नौ दो ग्यारह हो गए ।

 

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें