मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

एक व्यंग्य 77 : पहला और आखिरी इंटरव्यू

 एक हास्य व्यंग्य : इन्टरव्यू --पहला और आख़िरी

’जुगाड़’ लगा कर एक चैनल वाले को ’पटा’ लिया है ।बोला है रविवार को इन्टरव्यू ले लेगा तुम्हारा"--मिश्रा जी ने आते ही आते खुशख़बरी सुनाई
मैने कहा--" तुम्हारे मुँह घी-शक्कर।अन्धा माँगे क्या -दो आँख । भई मिश्रा जुगाड़ वाली बात किसी को नहीं बताना , नहीं तो हिंदी साहित्य जगत
में ग़लत संदेश जायेगा।
इधर मैं तैयारी में लग गया। कुर्ता धोती अंगरखा टोपी धुलवाकर तैयार करा लिया ।कम से कम परिधान से
तो साहित्यकार लगूँ।ड्राईंग रूम धो पोंछ कर ठीक किया। हीरोइनों की तस्वीरे हटा कर जयशंकर प्रसाद जी
,दिनकर जी ,निराला जी साहित्यकारों की तस्वीरे लगाईं ।दीवार पर बस इतनी ही जगह बची थी तस्वीर लगाने के लिए
।बाक़ी साहित्यकारों से क्षमा माँग ली ।।दीवारों को भी तो कुछ बोलना चाहिए।
बुकसेल्फ़ की सभी किताबों को झाड़-पोछ कर करीने से सजाया। किताबे तो थीं ,वर्षों से पढ़ी नहीं थी सो धूल चढ़ गई थी।कुछ किताबें मित्रों ने ’सप्रेम भेंट ’ की थी उसको लगाया। कुछ अपनी किताबें - छपीं तो ज़रूर मगर बिकी नहीं--उसकी 10-10 प्रतियाँ कतार में सजा कर लगा दी।कुछ किताबें वो थी -जो सरकारी लाइब्रेरी से लाई थीं मगर लौटाई नहीं थी -सो उन्हें भी सजा दी। हाँ कुछ किताबें अपने पैसे से खरीद कर लाया था, उन्हें भी लगा दी। चूँकि पैसा देकर खरीदा था सो पन्ना-पन्ना चाट डाला था ,पूरा पैसा वसूल कर लिया था पढ़ पढ़ कर ।सुनते हैं ,यह सब दिखाने से दर्शकों पर यथेष्ट प्र्भाव पड़ता है।अच्छा संदेश जाता है । कम से कम संदेश तो सही जाए।
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रविवार भी आ गया ।
मिश्रा जी ने परिचय कराया। यह है चौरसिया जी चैनेल वाले -यह हैं अख़्तर भाई, कैमरामैन
और यह है बन्दा ख़ाकसार-मैं ।चौरसिया जी "यू-ट्यूब’ पर एक चैनेल चलाते है "चैनल-अनाम’ के नाम से --वीडियो वगैरह
बनाते ,चढ़ाते रहते हैं । सिंगल विन्डो सिस्टम है --खुद ही प्रोड्यूसर.खुद ही ’डाइरेक्टर’, ख़ुद ही एडिटर -खुद ही
फ़ाइनेन्सर -ख़ुद ही -श्रोता --आल इन वन है।
--’आप की ज़र्रा नवाज़ी ,वरना यह ख़ाकसार क्या है !-- चौरसिया जी ने लखनवी अन्दाज़ में अपनी विनम्रता प्रकट की ।
इसी बीच अख्तर भाई ने कैमेरा,लाइट वग़ैरह सेट कर संकेत दिया ।साहब शुरु करें?
मिश्रा जी एक कोने में जा कर खड़े हो गए।
कैमेरा --लाइट --आन
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मैं एंकर आर0पी0 चौरसिया ’अनाम’ चैनेल से बोल रहा हूँ। आज हम पाठक जी का इन्टरव्यू करेंगे। पाठक जी को आप सभी लोग जानते होंगे -किसी के मुहताज नहीं है -सोशल मीडिया पर छाए रहते है- कभी फ़ेसबुक पर ,कभी व्हाट्स अप पर, कभी ब्लाग पर । फ़ेसबुक के लगभग हर प्रतिष्ठित मंच पर समूह में ग्रुप में जबर्दस्ती घुसे हुए हैं ।इनकी एक विशेषता है लतिआए जाने के बाद भी यह मंच या ग्रुप छोड़ते नही। यह इनके हिंदी के प्रति अगाध प्रेम का परिचायक है ।
इनका एक बड़ा मशहूर शे’र है जो हर आम-ओ-ख़ास की ज़ुबान पर मिस्ल की मानिन्द रहता है ।आप दर्शकों ने भी सुना होगा
जब कभी फ़ुरसत मिले ’आनन’ से मिलना
मिल जो लोगे बाहर ही मिलते रहोगे ।
-चौरसिया जी ! ’बाहर ही ’ -नहीं ’बारहा”- -बारहा- ,बार बार
-सही पकड़ा हाँ वही वही --बारहा मिलते रहोगे।
तो अब हम पाठक जी से सवाल जवाब का सिलसिला शुरु करते है ।
चौ0 -- हाँ तो पाठक जी ! देश यह जानना चाहता है कि आप को यह शायरी का शौक़ कब से लगा ?
मैं -- - बचपन से । आप कह सकते हैं कि कक्षा 1-या 2 में था तभी से लगा ।शौक़ नही रोग कह सकते है आप इसे।
चौ0--- कक्षा 1 से ? अरे वाह ! वह कैसे ?
मैं - मास्साब लिखना सिखा रहे थे --- --सदल --बल ---घर से निकल -न कर नकल -दुनिया बदल---लेकिन सँभल -कि मैने अपनी तरफ़ से यह जुमला जोड़ दिया --अब घर चल
-मेरे इस "क़ाफ़िया बन्दी" से ’मास्साब’ इतना ख़ुश हुए कि बोले बेटा !तू घर जा । तू बाद में शायर बनेगा। और तब से आज तक तुकबन्दी कर रहा हूँ।
जिसे आप शायरी समझते हैं ।
चौ- -- अच्छा अच्छा ।आप के मास्साब ने आप में शायरी की असीम सम्भावनाएँ देखी होंगी । उसके बाद ?
मैं --- -- उसके बाद खींच तान कर किसी प्रकार हाई-स्कूल तक चला आया ,’भाषा-भास्कर ’काव्य कौमुदी" रट रटा कर पास हो गया।
सूर-कबीर-तुलसी रटा -- एक दोहा तो आज भी याद है
सूर ’सूर’ तुलसी ’शशि ’ उडगन केशव दास ।
अब के कवि खद्योत सम ,जहँ तहँ करत प्रकास ।
परीक्षा में --सूरदास की जीवनी रट कर गया था मगर ’तुलसी दास’ जी आ गए। फिर क्या था --दोहा तुरन्त बदल दिया।
सूर ’शशि’ तुलसी ’रवि’ उडगन केशवदास ।
अब के कवि खद्द्योत सम,जहँ तहँ करत प्रकास ।
और मैं पास हो गया ।
मगर फिर भी 100 में 100 नहीं आया । तब हिंदी का इतना विकास नहीं हुआ था ।अब तो जिसको
देखो हिंदी में भी 100 में 100 ला रहा है ।हिंदी का कितना विकास हो गया तब से अबतक । तब मुझे पहली बार हिंदी की ताक़त का पता चला कि कैसे किसी को ’सूर्य’ और किसी को ’शशि" बनाया जा सकता है मिनटों में ।जिसकी चर्चा हो जिस पर इन्टरव्यू हो --वह ’सूर्य’ है । बाकी सब खद्योत ।किसी को एक पल में ’सूर्य’ बताने की क्षमता मात्र हिंदी में है । हमारे हिंदी लेखकों ,आलोचकों और समीक्षकों में यह परम्परा आज भी क़ायम कर रखी है।
।जिसको चाहें उसको अज़ीमुश्शान शायर क़रार दे दे--,सशक्त हस्ताक्षर बना दें --सदी का अन्तिम कवि बता दे --वरिष्ठतम साहित्यकार बता दे --विख्यात कवि- विश्वविख्यात भी बता दें -बर्रे सगीर के अज़ीम शायर---ब्ला ब्ला ब्ला ।
मरजी उनकी ।सिक्का चल गया तो चल गया।अब तो हर तीसरा व्यक्ति फ़ेसबुक पर समीक्षक हो गया।
चौ0 -- अच्छा अच्छा । आप के लोकप्रिय गीतकार कौन है?
मैं-- शकील बदायूँनी ।
चौ0-- शकील बदायूँनी ही क्यों ?
मैं -- क्योंक आप ने प्रोग्राम उन्हीं पर रखा है तो उन्हीं को बताऊँगा न । हमारी भारतीय संस्कॄति है और हिंदी की परम्परा रही है कि हम मॄतात्मा को ही महान बताते है । भगवान उनकी आत्मा को शान्ति दें । ख़ुदा मगफ़िरत करे । आप शैलेन्द्र जी पर प्रोग्राम कीजिएगा तो शैलेन्द्र जी को महान बताऊँगा---‘वचने किम् दरिद्रता-।-कहने में क्या जाता है ?
चौ0-- और निराला जी ?
मैं "निराला जी" फ़िल्मी गीत नहीं लिखते थे ।अत: उनके बारे में मैं कुछ ज़्यादा नहीं बता पाऊँगा ।
चौ0 -- अच्छा ,अच्छा ।आप शकील साहब को कब से जानते हैं ?
मैं --परसों से।
चौ0 --- अच्छा अच्छा । बरसों से। बहुत अच्छा।
मैं - "बरसों" नहीं बाबा । ’परसों’ से ,परसों । जब आप ने इन्टरव्यू का ”डेट-फ़िक्स’ किया तब से मैने शकील साहब को पढ़ना शुरु किया } अब तो मैं घंटों व्याख्यान दे सकता हूं शकील
साहब की गीतो के नए आयाम -गीतो में नई संभावनाएँ--उनके गीतों का समग्र मूल्यांकन--गीतों का एक नया क्षितिज --एक नया --। कुछ महारथी तो ऐसे भी हैं जो
इस तीन दिन के अध्ययन से शकील साहब पर एक पूरी किताब लिख सकते हैं और लिखते भी हैं।
चौ0 --- सुना है कि आजतक आप ने कोई मुशायर नहीं पढ़ा।कहते हैं जो दिखता है वो बिकता है ।
मैं -- सड़े अंडे -टमाटर से डर लगता है । चिपक जाता है। अब कमर में वो लचक भी नहीं रही। राज़ की बात तो यह है भइए -बन्द मुट्ठी लाख की --खुल गई तो खाक की ।
जी सही कहा आप ने--जो दिखता है वो बिकता है ।मैं ’बिकता’ नहीं--सो "दिखता" नहीं।तुम्हारे चैनेल में कोई महिला एंकर नहीं है क्या कि तुम्हीं इन्टरव्यू लेते हो ?
चौ0 -- है न ।’गुत्थी’ को भेज दूँ क्या ?
मैं --नही नहीं रहने दो। आप ही ठीक हो । आगे बढ़ो।
चौ0 -- आप को किसी फ़ेसबुक मंच ग्रुप वालों ने ’पुरस्कार" नहीं दिया । सान्त्वना पुरस्कार भी नहीं।पुरस्कार तो किलो के भाव बँटते है आजकल मंचों पर ।
मैं-- हाँ । उन्होने मुझे किसी ने इस योग्य नहीं समझा होगा ।ऐसे वैसे न जाने कैसे कैसे लोग पुरस्कार पा गए । कुछ लोग तो अपने अपने नौकर ,दरबान तक के लिए भी ले गए।
। किसी को काव्य शिरोमणि का मिला--किसी को गज़ल सम्राट का--किसी को गीत विशारद का -किसी को दोहा मणि का--किसी को साहित्य रत्न --किसी को काव्य रत्न का
अंधा बाटे रेवड़ी फिर फिर अपने दे--। नीरज जी ने कहा भी है
जिनको फूलों की ख़ुशबू न पहचान थी
उनके घर फूल की पालकी आ गई
एक मंच वाले के पास गया भी था -’ भइए- कुछ मुझे भी पुरस्कार तिरस्कार मिलेगा ? बोले आप का पाकेट ज़रा हल्का है । यहाँ पुरस्कार ग़ज़ल कविता दोहा के वज़न से नहीं पाकॆट की वज़न से पुरस्कार मिलता है।ग़ज़ल गहरी हो न हो ,पाकेट ज़रा गहरा होना चाहिए। मैं चला आया ।-मुझे उनके स्तर तक उतरना होगा । एक मंच वाले से जुगाड़ लगाया तो यह कह कर टरका दिया कि सर आप तो ’लाइफ़ अचीवमेन्ट अवार्ड’
के मैटेरियल हो आप पुरस्कार लेकर क्या करोगे? मैं इतने से ही खुश हो गया। मेरा पुरस्कार मिल गया।उन भाई साहब के मंच का नाम नहीं बताऊँगा । अब वह मेरी ’लाइफ़’ का इन्तज़ार कर रहे हैं-वह सोच रहे हैं कि मैं ’टपकूँ’ तो वह ’लाइफ़ अचीवमेन्ट पुरस्कार दे -और मैं सोच रहा हूँ कि वह पुरस्कार दें तो मैं ’टपकूँ’ ।
परस्पर विश्वास का प्रश्न है।
एक बात और । जिस मंच पर हूँ ,वहाँ पुरस्कार नहीं बँटता। जहाँ पुरस्कार ’बँटता" है ,वहाँ मैं हूँ नहीं।कभी नदी-नाव संयोग कभी बना ही नहीं ।
चौ0 सर ! एक सवाल और। आप का ’कविता’ के बारे में क्या विचार है?
मैं ’कविता’ एक अच्छी और खूबसूरत कवयित्री है। उसमें असीम संभावनाएँ है । हिंदी जगत को उस से बहुत उम्मीद है।
चौ0 सर ! मैं उस कविता की बात नही कर रहा हूँ । मै तो--
मैं कोई बात नहीं। कोई कविता -सविता -वनिता--विनीता- गीता -सीता -हो -सब में हिंदी के प्रति असीम संभावनाएँ छुपी हैं। हिंदी जगत को इन सबसे बहुत उमीद रहती है ।
अपेक्षा रहती है । इस मामले में हिंदी बड़ी उदारमना है विशाल हृदया है । हिंदी ’जेन्डर-भेद ’ नहीं करती। सबमें असीम सम्भावनाएँ समान रूप से देखती है । सनद बाँटती रहती है।
परन्तु 2-4 साल बाद ये ’संभावनाएँ’ कहाँ मर जाती है पता नहीं चलता।
दद्दू गोपाल प्रसाद व्यास जी का मत है
कविता करना है खेल सखे !
जो चाहे इसमें चढ़ जाये, यह बे-टी0टी0 की रेल सखे । कविता करना है खेल, सखे !
फ़ेसबुक और व्हाट्स अप के सौजन्य से बहुत से लोग इस रेल के डब्बे में घुस गए हैं ।ठसा ठस भर गए हैं। कुछ लोग तो डब्बे के छत पर चढ़ कर ’फ़ेसबुक लाइव’ हो रहे हैं।
’सेल्फ़ी ’ खींच रहे हैं ।जब तक यह फ़ेसबुक व्हाट्स अप रहेगा ,कविता-ग़ज़ल नहीं मरेगी । आप निश्चिन्त रहें ।
चौ0 -- सर ! अब चलते चलते एक सवाल -और।
मैं -- नहीं ।आप बैठे बैठे भी पूछ सकते है ।
चौ0 --- ज़रा परसनल सवाल है । मगर देश की जनता जानना चाहती है ---कि आप का कोई --यानी जवानी में--मतलब कि -कोई --लफ़ड़ा-तफ़ड़ा --यानी
कहीं टांका-कांटा --मतलब कि -आप समझ रहे हैं न ?
मैं - हाँ हाँ क्यों नहीं समझूँगा-भाई -मुझ से बेहतर और कौन समझेगा ।-पूरी जवानी तो-- टांका भिड़ा रे ! --काँटा लगा रे ! में ही गुज़री। अब ज़रा उमर ढल गई ,वरना--- । --मगर वो भी क्या दिन थे। "ठंडी हवाएँ --काली घटाएं--- सुहाना सफ़र और ये मौसम हसीं -।पर क्या कहें--हमने ज़फ़ा न सीखी--उसको वफ़ा न आई। ये न थी हमारी किस्मत कि विसाल-ए-यार होता।-एक बार उसका ’व्हाट्स अप ’ आया था --पराई हूँ पराई, मेरी आरज़ू न कर ।नसीब में जिसके जो लिखा था-- पता नहीं कहाँ होगी ’बेचारी’---
"अच्छा तो अब वो बेचारी’-??- मैं फिरूँ मारी मारी- ?"- देखा "बेलन धारिणी ’ श्रीमती जी--आँखे लाल लाल किए सामने खड़ी हैं।
’ऎं ! तुम कहाँ से आ गई? --मैने लगभग घिघियाते हुए स्वर में बोला लगा जैसे लगा रंगे हाथ गिरफ़्तार हो गया ।
--सब जानती हूँ --कहाँ कहाँ लफ़ड़ा है तुम्हारा ।जनाब ने --मोबाइल में ’पासवर्ड’ क्या मार दिया ,समझते है कि हमें ख़बर ही नहीं? सब खबर है । फ़ेसबुक पर सारी ग़ज़ले
पढती हूँ गीत --माहिए पढ़ती हूं~ तुम्हारी । उड़ती चिड़िया का पंख गिन कर हाथ में रख दूँ । और चले हैं---
भाग्यवान सुनों तो । तुम तो बस खाम ख़्वाह--बात का बतंगड़बना रही हो--राई का पहाड़ बना रही हो -समझो तो ज़रा -। मैने सफ़ाई पेश करने की कोशिश की
-’चुप रहो जी ! नकली दाँत लगाए घूम रहे हैं --बाल उड़ गए-मगर -प्रेम गीत पर प्रेम गीत-- प्रणय-गीत लिखे जा रहें है।जनाब के कब्र में पैर लटकाने के दिन आ गए--
क्या लिखा था उस दिन-- ये लचकती महकती हुई डालियाँ-? -बड़ा मटक मटक कर लिखा था उस दिन ।सारी -मटकन -लटकन--झटकन निकाल दूँगी। जनाब को जवानी चढ़ी है-- तेरी नील झील सी आंखो में---अरे तो डूब कर मर क्यॊ नहीं गए उस ’बेचारी’ की आँखों में --मेरी तो ज़िन्दगी बर्बाद न होती-
----फ़ोड़ कर रख दूँगी उसकी आँखे--तुम्हारे उस बेचारी की।
अरे! भागवान ! तुम तो बेमतलब---अरे सुनो तो--
श्रीमती जी के सर, रण-चण्डी ’दुर्गा’ उतरते देख, अख़्तर भाई ने जल्दी जल्दी अपना कैमेरा-लाइट समेटा और चौरसिया जी ने अपना नोटबुक ।
भाग खड़े हुए ।आगे आगे वो ---पीछे पीछॆ मै----और मेरे पीछे एक कुत्ता।" -- अरे चौरसिया जी --बाकी इन्टरव्यू तो करते जाओ --समापन तो करते जाओ-"-
---हो गया--हो गया --चौरसिया जी हाँफ़ते हाँफते हुए बोल रहे थे या बोलते बोलते हाँफ़ रहे थे ,पता नहीं ।
लौट कर देखा तो वह मिश्रा का बच्चा हाथ बाँधे कोने में खड़ा खड़ा मुस्करा रहा था । उसी की शैतानी रही होगी ।
अस्तु
-आनन्द.पाठक-
 
 
 

1 टिप्पणी:

  1. श्रीमती जी के सर, रण-चण्डी ’दुर्गा’ उतरते देख, अख़्तर भाई ने जल्दी जल्दी अपना कैमेरा-लाइट समेटा और चौरसिया जी ने अपना नोटबुक ।
    भाग खड़े हुए ।आगे आगे वो ---पीछे पीछॆ मै----और मेरे पीछे एक कुत्ता।" -- अरे चौरसिया जी --बाकी इन्टरव्यू तो करते जाओ --समापन तो करते जाओ-"-
    ---हो गया--हो गया --चौरसिया जी हाँफ़ते हाँफते हुए बोल रहे थे या बोलते बोलते हाँफ़ रहे थे ,पता नहीं ।😀😀😀
    अति उत्तम

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