मंगलवार, 11 जुलाई 2017

एक लघु च्नितन:---देश हित में---

एक लघु चिन्तन : --"देश हित में"

जिन्हें घोटाला करना है वो घोटाला करेंगे---जिन्हें लार टपकाना है वो लार टपकायेगें---जिन्हें विरोध करना है वो विरोध करेंगे--- सब अपना अपना काम करेगे ।
ख़ुमार बाराबंकी साहब का एक शे’र है

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है , हवा चल रही  है 

दोनो अपना अपना काम कर रहे हैं} एक कमल है जो कीचड़ में खिलता है और दूसरा कमल का पत्ता है जो सदा पानी के ऊपर रहता है --पानी ठहरता ही नहीं उस पर।
----आजकल होटल -ज़मीन -माल -घोटाला की हवा चल रही है -थक नहीं रही है -- बादल घिर तो रहे हैं मगर बरस नहीं रहे हैं।

-----जो देश की चिन्ता करे वो बुद्धिजीवी
-----जो चिन्ता न करे वो ’सुप्त जीवी’
------जो ;पुरस्कार’  लौटा दे वो ’सेक्युलर’
-------और जो न लौटाए वो ’कम्युनल’  है
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मैं कोई पुरस्कार का”जुगाड़’ तो कर नहीं पाया तो लौटाता क्या । नंगा ,नहाता क्या---निचोड़ता क्या

सोचा एक लघु चिन्तन ही कर लें  तब तक -’देश हित मे’ --- दुनिया यह न समझ ले कि  कैसा ’ सुप्त जीवी प्राणी ’ है यह कि ’ताल ठोंक कर’- बहस भी नहीं देखता।
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कल ’लालू जी’ ने एक निर्णय लिया  --देश हित में
आज ’नीतीश जी’ ने एक निर्णय लिया --देश हित में
भाजपा ने  एक ’चारा’ फ़ेंका  --  देश हित में
एक ने  वो ’चारा’ नहीं खाया --देश हित में
दूसरा ’ चारा’  खा ले  शायद  --देश हित में
तीसरा ’हाथ’ दिखा दिखा कर थक गया ---देश हित मे

तो क्या? सब का ’देश हित’ अलग अलग है ।
या सबका  ’देश हित’ एक है --कुर्सी-
और जनता ?
----जनता चुप होकर देखती है -----देश हित में
 -ग़ालिब का शेर गुनगुनाती है

बाचीज़ा-ए-अत्फ़ाल है दुनिया मेरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे

गो हाथ में जुम्बिश नहीं आंखों में तो दम है
रहने दो अभी सागर-ओ-मीना मेरे आगे


जनता के लिए कौन है रोता यहां प्यारे
सिद्धान्त" गया भाड़ में , ’सत्ता’ मेरे आगे

आखिरी वाला शेर गालिब ने नहीं कहा था।
 हाँ , अगरऔर ज़िन्दा रहते--तो यही कहते---" कि खुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता "-। ख़ुदा मगफ़िरत करे

जनता तो --बस तमाशा देख रही  है -- आश्वस्त है कि ये सभी ’रहनुमा’ मेरे लिये  चिन्ता कर रहे हैं॥ हमें क्या करना ! -हमे तो 5-साल बाद चिन्ता करना है ।एक सज्जन ने लोकतन्त्र का रहस्य बड़े मनोयोग से सुनाया--"बाबा !जानत हईं ,जईसन जनता चाही वईसन सरकार आई" ---मैंने  परिभाषा पर तो ध्यान नहीं दिया मगर ’बाबा’ के नाम से ज़रूर सजग हो गया--पता नहीं यह कौन वाला  ’बाबा ’ समझ रहा है मुझे।
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उस ने कहा था---महागठ्बन्धन है ---टूटेगा नहीं---’फ़ेविकोल से भी ज़्यादे का भरोसा है --जब तक ’कुर्सी’ नहीं छूटेगी ----गठबन्धन नही टूटेगा--- सत्ता का शाश्वत  सत्य है---- जनता मगन होई  नाचन लागी --- ’सुशासन’ महराज की जय
भईए ! हम तो ’समाजवाद’ लाने को निकले थे ---सम्पूर्ण क्रान्ति करने निकले थे --।हम पर तो बस  समझिए  ’जयप्रकाश नारायण जी ’ का आशीर्वाद रहा कि फल फूल रहे है जैसे अन्ना हज़ारे जी के चेले फल फूल रहे है जैसे गाँधी जी के चेले फल फूल लिए।
और जनता -कल भी वहीं थी  आज भी वहीं है---]सम्पूर्ण क्रान्ति’ के इन्तिज़ार में---

नई सुबह की नई रोशनी लाने को जो लोग गए थे
अंधियारे  लेकर लौटे हैं जंगलात से घिरे शहर  में

 दुनिया में क्या सम्पूर्ण है, सिवा भगवान के --वो तो मिलने से रहे। बस जो मिला वही लेते आये अपने घर ---बेटी  दमाद  बेटा-बहू भाई ,भतीजा --सब समाजवादी हो गए -चेहरे पे नूर आ गया ।कहते हैं- चिराग पहले घर में ही जलाना चाहिए --। सो मैने घर में ही ’समाजवाद’ का चिराग जला दिया-क्या बुरा किया-। कहने दीजिए लोहिया जी को--ज़िन्दा क़ौमे 5-साल इन्तिज़ार नहीं करती----
 मैने कहा था--भइए----
साथ अगर है छूटेगा ही
’गठ बन्धन’ है टूटेगा ही
कुर्सी पे चाहे जो बैठे
बैठा है  तो लूटेगा  ही 
’हाथ’ भला अब क्या करलेगा
डूबा है तो डूबेगा ही

 ऋषि मुनियों ने कहा ----वत्स आनन्द ! ज़्यादे चिन्ता करने का नी। चिन्ता ,चिता समान है।
कहाँ तक चिन्ता करुँ -झोला लट्काए ।,मेरे जैसे चिन्तक के लिए इतना ही चिन्ता काफी है -- सो अब आज का चिन्तन यहीं तक। कल की चिन्ता कल पर।
अस्तु

-आनन्द पाठक-
08800927181

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

एक लघुव्यथा : अन्तरात्मा की पुकार

एक लघु व्यथा: अन्तरात्मा की पुकार ...[व्यंग्य]

--’अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़   ’ ’फ़लाना पार्टी में शामिल हो गए।

      बीती रात जब वो सो रहे थे तो उनकी अन्तरात्मा एकाएक जाग गई । ऐसी ही  अन्तरात्मा एक बार बाबू जगजीवन राम जी की भी जगी थी कि कांग्रेस छोड़ दिया था और तब से  ’आया राम ,गया राम, चल पड़ा।तत्पश्चात कई लोगों की अन्तरात्मा जगने लगीऔर वोअपना दल छोड़ सामने वाले दल में जाने लगे इस उम्मीद से कि वहाँ उनकी अन्तरात्मा को कोई पद मिल जाये...कुर्सी मिल जाए  तो आत्मा को   शान्ति मिल जाए। एक मित्र ने पूछा -जब कोई पुरुष दल-बदल करता है तो ’आया राम गया राम’ कहते हैं परन्तु जब एक महिला नेत्री दल बदल करती है तो उसे क्या कहते हैं ? मैने कहा "--आई रीता,गई गीता । रीता माने ’खाली’, हाथ कुछ भी नहीं ।-कई वर्षों तक पार्टी की अथक सेवा करने के बाद भी कोई लाभकारी पद न मिले ...मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिले ...किसी संस्था का अध्यक्ष पद न मिले तो ’आत्मा’ बेचैन हो जाती है  और जग जाती है ।  उनकी  आधी रात को जग गई । कोसने लगी ’-हे मूढ़ पुरुष !  ।  एक ही पार्टी की विचारधारा वर्षों से धारण करते करते तेरे वस्त्र मैले हो गए ..जीर्ण-शीर्ण हो गए -यत्र तत्र से फट फटा गए हैं जिस समाजवाद को तू सीने से चिपकाए  फिरता है वो तो छ्द्म समाजवाद है .तेरा समाजवाद तेरे घर से उठ कर तेरे भाई ,तेरे पुत्र ,तेरी पुत्र-वधू ,तेरे भतीजे ,तेरे भांजे तेर साले से घूम फिर कर तेरे नाती पोतो तक  आ जाता है ।क्या तेरा ’सेक्यूलिरजम’ झूठा नहीं है? छद्म नहीं है ? रोज़ा में इफ़्तार पार्टी  देता है , अयोध्या में ’हनुमान गढ़ी जाता है.....  गुरुद्वारा में सरोपा ग्रहण करता है .... वोट बैंक में सेंध लगाता है ...किसलिए ..कुर्सी के लिए न .।क्या ..तेरा सर्वधर्म समभाव ..... का नारा कुर्सी के लिए नही है ? वोट के लिए नहीं होता  ....।वोट के लिए ..जालीदार टोपी लगा लेता है ...तिलक भी लगा लेता है...तराजू भी  तौल लेता है ...तलवार वालों को जूते भी मार देता है । क्या  वर्षों से तू अपने आप को नहीं छल रहा है ?  उठ ! छोड़  यह पार्टी ..तेरी दाल अब तक नहीं गली तो आगे भी नहीं गलेगी। हाशिये पर आ गया है तू ।  पार्टी का झंडा अपनी साईकिल पर लगाए कब तक चलेगा ।कब तक पार्टी अधिवेशन में जाजिम बिछायेगा...दरी उठायेगा ..पानी पिलायेगा ,,,खाली पेट सेवा करता रहेगा ।जब  फल मिलने का समय आता है तो  हाइ-कमान ’बाहर’ से भेज देता है किसी ग़ैर को पार्टी की सेवा करने का और तू ठगा ठ्गा सा रह जाता है ।उतिष्ठ मूढ़ ! उतिष्ठ ! छोड़  यह पार्टी ...यहीं सड़ेगा क्या....

अब उनकी अन्तरात्मा जग चुकी हैअब सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा  है । आत्मा निर्मल हो चुकी है । पुरानी पार्टी में छिद्र ही छिद्र था । कितनी मैली-कुचैली थी पुरानी पार्टी -कितनी दुर्गन्ध भर गई है वहां । कैसे रहा इतने दिन तक इस सड़न्ध में  कि जानवर भी न रहे ।कितनी संवेदनहीन थे वे लोग ...मेरे खून को खून न समझ सके....मेरे पसीने को पसीना न समझा । हाई कमान से मिलने का समय माँगो तो समय नहीं मिलता राजकुमार जी से मिलने का  तो सवाल ही नहीं। घुटन थी उधर .......अपने नेतॄत्व तो करते नहीं ...हमें करने नहीं देते ....बस जाजिम बिछाते रहो,,,दरी उठाते रहो...पानी पिलाते रहो...

 अटकले लगती है ।खबर चलती है ,नाटक चलता है ।नहीं नहीं... मैं  नहीं जा रहा हूँ ...मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ ....सब मीडिया की साजिश है,,,,मैं तो पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं ....पार्टी जो दायित्व सौपेंगी निष्ठा के साथ निभाऊँगा...मुझे मुख्यमंत्री बनने की  कोई इच्छा नहीं ...मैं तो पार्टी की सेवा के लिए पैदा हुआ हूँ ..वफ़ादार सेवक हूँ ....पार्टी की ऐसे ही सेवा करते करते मर जाऊँगा ...मेरी हर एक साँस देश के लिए है... पार्टी के लिए है...गरीबों के लिए है ..दलितों के लिए हैं..मज़दूरों के लिए है ...किसानों के लिए  ......मै तो बस देश हित के लिए साँस धारण किए हुए हूं।

उनकी साँस तो जवाब नहीं देती हैं ,अनुशासन जवाब दे जाता है और एक दिन सुबह उठ कर किसी अधो वस्त्र की तरह विचारधारा बदल देते है  !’वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृहणाति नरोपराणि.....
और फिर अचानक , अलाना पार्टी का ’हाथ’ छोड ’फ़लाना’ पार्टी का ’फूल’ थाम लेते हैं  ......रात-ओ-रात विचारधारा बदल लेते हैं ..सोच बदल लेते है ... संस्कार बदल लेते है... स्वयं हित के लिए नहीं ..परिवार हित के लिए  ...कुर्सी के लिए ...सत्ता सुख के लिए.
चुनाव काल में ऐसे ’आया राम गया राम ’को  लालू जी ’मौसम वैज्ञानिक’ की संज्ञा देते है । वह ’राम’ समझदार है जो चुनाव काल में मौसम का ,हवा का रुख देख कर पाला बदल लेता  है।
कुर्सी में गुन बहुत है ,सदा राखियो ध्यान
उड़ो हवा के संग सदा ,यह मौसम विज्ञान
ये मौसम विज्ञान , ’विचार’ की ऐसी तैसी
अपने ’राम’ चले जिधर मिल जाए ’कुर्सी’

जनता को छकने-छकाने के बाद ,अन्तत: घोषणा हो गई -अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़ ’फ़लाना’ पार्टी में शामिल हो गए।
 मंच सजाए जाने लगे ,स्वागत की तैयारियां की जाने लगी ...माला फूल मँगाए जाने लगे... इत्र-फुलेल छिड़के जाने लगे ,...केवड़ा जल का छिड़काव जारी है  .हाथ में ’कमल’ का फूल थमाना है .....’अलाना सिंह’ कह चुके हैं कि पुरानी पार्टी में काफी दुर्गन्ध है ।अगर   पुरानी पार्टी से वह कोई ’दुर्गन्ध’ साथ लाते हैं  तो नई पार्टी में न फ़ैले। ।पुरानी पार्टी को ज़ोरदार झटका दिया है तो स्वागत भी ज़ोरदार होना चाहिए।
प्रेस कान्फ़्रेन्स में ’ए बिग कैच मछली " प्रस्तुत किया गया --देखो प्रेस वालों ... अन्य पार्टी वालों -क्या तीर मारा है मैने

पत्रकार -  अलाना सिंह जी ! आप ने नई पार्टी क्यूँ ’ज्वाईन’ की। क्या देखा  इस में  ऐसा कि रात-ओ-रात ...?
अलाना सिंह- ’  देखो भई ! मेरे रग रग में देश भक्ति कूट कूट कर भरी है। हम खानदानी ’देशभक्त हैं ...जिधर देश भक्ति उधर मैं....देश पहले है ,पार्टी बाद में ,विचारधारा उसके बाद में और मैं तो सबसे बाद में । मुझ से किसान भाईयों का दर्द देखा नहीं जा रहा था -जिन ग़रीब किसान भाईयों के हाथ में ’ सिंहासन ’ सौपना था,  आप ने ’’खाट’  सौंप दिया और वह भी ’झिलंगी’ --यह किसान भाईयों का ही नहीं बल्कि ’खाट" का भी अपमान है ।मुझ से यह अपमान देखा नहीं जा सका सो इधर चला आया।मेरे देश के जवान सीमा पर अपने प्राण न्योछावर कर रहे हैं... हमारी  बहने विधवा हो रही है  ..कलाईयां सूनी हो रही है  ...और कोई कहे कि ’खून’ की दलाली है ..मैं आहत हो गया...सो इधर चला आया....
पत्रकार - मगर यह बयान तो महीना भर पहले आया था...तब तो आप ने पार्टी नहीं छोड़ी
अलाना सिंह -- तो क्या हुआ ? जब समझ में आया तब छोड़ी ,..
पत्रकार - मगर आप के पुराने साथी तो कह रहे हैं कि आप ’दगाबाज’ है?
-ठीक ही कह रहे होंगे।दगाबाजी -का मतलब  उनसे ज़्यादा और कौन समझता होगा । जब वो साईकिल के पीछे पीछे दौड़ रहे थे और पीछे कैरियर पर बैठने की जगह नहीं मिली तो ’हाथ’ पर आकर बैठ गए तब दगाबाजी नहीं दिखी
लोग कहते हैं कि मैं हाशिए पर आ गया था । भईए ! पार्टी का सच्चा सिपाही तो हाशिए पर ही रहता है ....पार्टी के मुख्य में तो जुगाड़ी  ...दरबारी...चमचे ..चरणस्पर्शी ...दण्डवती ..रहते है --उन्होने एक दीर्घ उच्छवास छोड़ते हुए अपना दर्द उडेला ।

तमाम उम्र  कटी पार्टी की सेवा करते 
आखिरी वक़्त में क्या खाक ’जुगाड़ी’ बनते 

-अलाना भईया की जय ...फलाना पार्टी की जय ...जिन्दाबाद ..जिन्दाबाद ...भईया जी संघर्ष करो....हम तुम्हारे साथ हैं--वन्दे मातरम -समर्थको ने नारा लगाया

अलाना सिंह  मुस्करा दिए--डूबते को तिनके का सहा्रा न सही ....तो ’कमल’ का डंठल ही सही।

अस्तु

-आनन्द.पाठक-
  

गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

एक लघु व्यथा : खाट...खटमल...खून [व्यंग्य]

एक लघु व्यथा  : खाट...खटमल....खून...[व्यंग्य]

[नोट -आप ने ’बेताल-पच्चीसी’ की कहानियाँ ज़रूर पढ़ी होंगी जिसमें राजा विक्रमादित्य जंगल में , बेताल को डाल से उतार कर,और कंधे पर लाद कर  चलते हैं और बेताल रास्ते भर एक कहानी सुनाते रहता है ।बेताल  शर्त रखता है कि अगर राजा  ने रास्ते कुछ बोला तो वह  उड़ कर  डाल पर जा कर लटक जायेगा.....
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 ......................राजा विक्रमादित्य  ,बेताल को डाल से उतार कर चलने लगे ।
-बेताल ने कहा-हे विक्रम !- रास्ता लम्बा है तू थक जायेगा .चलो  मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ..
राजन चुप रहे
’तो सुन ’
राजन चुप रहे
प्राचीन काल में एक राजा थे  जिसकी कई पीढ़ियों ने राज्य पर शासन किया } अभी राजकुमार का राज्याभिषेक भी नहीं हुआ था  कि राजा के हाथ से  सत्ता  निकल गई ।और वह सत्ता विहीन हो गए। ।राजा के पुराने वफ़ादार और दरबारी चाहते थे कि किसी प्रकार राजकुमार जी का राज्याभिषेक हो जाए ...सत्ता सम्भाल लें तो हम सब भी वैतरणी पार कर लें। वे  हर प्रकार से उन्हें आगे ठेलने की कोशिश कर रहे थे कि राजकुमार जी आगे बढ़े गद्दीनशीन हो जायें परन्तु  राज कुमार जी ऐसे कि आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं।वह कोशिश तो बहुत कर रहे थे ।समर्थकों ने नारा भी लगाया कि भईया जी आप आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है .जब तक सूरज चाँद रहेगा ,भईया जी का नाम रहेगा ,सबका साथ ..भईया जी का हाथ .,.परन्तु  भईया जी वहीं के वहीं रह जाते ...जब लोग ज़्यादे ज़ोर लगा कर ठेलते थे तो राजकुमार जी 2-3 महीने के लिए ’गुप्तवास " में चले जाते थे फिर उनके समर्थक उन्हें खोजते फिरते थे । किसी ने अगर भईया जी से आगे निकल कर नेतॄत्व करना चाहा तो कुछ दरबारी लोग  उसे पीछे ठकेल देते थे  राजकुमार जी के रहते तुम्हारी ये मजाल .....जिसने कोशिश की उसको पीछे ठकेल दिया .गया ....भईया जी के पीछे ..।और इस प्रकार राजकुमार  जी आगे -आगे चलते रहे...बस चलते ही रहे ...
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कुछ सलाहकारों ने सलाह दिया कि राजकुमार जी को अगर फ़र्श से अर्श तक उठाना है ..सिंहासन पर बैठाना है तो पहले "खाट’ पर बैठाना होगा...

-’विक्रम ! खाट तो समझता है न ।खाट को ’खटिया’ चारपाई ,,शैय्या भी कहते हैं हैं । ’फ़ेसबुक’..वाली पीढ़ी  संभवत: ’खटिया ’नाम से परिचित न हो ,मगर -’सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे’- से ज़रूर परिचित होती है ।जाड़े में खटिया की उपयोगिता ज़रूर समझती  है ,’सरकाने के काम आती है --’सरकाने’ की सुविधा सिर्फ़ खटिया में ही है --’किंग साइज़’.और .क्वीन साइज़ बेड में   नहीं । क्वीन साइज़ बेड को ’सरकाने’ की सुविधा नहीं होती है- खुद ’सरकाने”की सुविधा होती है
खाट का हमारे जीवन से क्या संबन्ध है तू तो जानता ही होगा। जन्म से लेकर कर मॄत्यु तक . ..जीवन के साथ भी..जीवन के बाद भी...बिल्कुल जीवन बीमा निगम की तरह ..जीवन के बाद . दान करते है  खाट  --किसी  महापात्र को।खाप पंचायत के ताऊ जी इसी खटिया  पर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़ाते है ..... हुकुम सुनाते है और समाज की इज्जत बचाते हैं...।
खाट है तो खटमल भी होगा । खटमल न देखा हो तो देवानन्द की  फ़िल्म ,’छुपा रुस्तम’  देख लेना -"धीरे से जाना ’खटियन’ में ..ओ खटमल ...धीरे से जाना खटियन में । जिसमे देवानन्द जी खटमल को उकसा  रहे हैं जा बेटा जा खटियन में और हीरोइन का खून चूस ..मेरी तो वो सुनती नहीं है , तू ही जा सुना ।
अब खटमल है तो खून चूसेगा ही ...धीरे धीरे चूसे , जोर से चूसे...बार बार चूसे.   या 5-साल में एक बार चूसे . छुप छुप के चूसे या सरेआम चूसे ...मगर चूसेगा  ज़रूर खून। ज़रूरी नहीं कि ’गाँधी-टोपी’ लगा कर ही चूसे  । राजनीति में भी बहुत खटमल पैदा हो गए हैं और हमारी खाटो में घुस गए हैं ..चैन से सोने भी नहीं देते

सलाहकारों ने सलाह दिया कि राजकुमार जी को अगर सिंहासन पर बैठना है तो पहले "खाट’ पर बैठना होगा...पी0के0 साहब इस रहस्य को जानते हैं । सलाह दे दिया ’खाट पंचायत: करो..खाट पर चर्चा करो  ..यही ’खाट’- विरोधी पार्टी की नाक काटेगी। अब तो खाट पर ही भरोसा रह गया । जनता का क्या है ...खटिया बिछा दी तो बिछा दी..नहीं तो  खड़ी कर दी  ....दिल्ली  में एक पार्टी के लिए बिछा दिया तो बिहार में दूसरी पार्टी की   खड़ी कर दी। जनता का  क्या है --’किसी को तख्त देती है ,किसी को ताज देत्ती है  ..बहुत खुश हो गई जिस पर उसी को राज देती है "वरना खाज देती है । इसी से चुनाव वैतरणी पार हो जाये शायद ,अब तो इसी खाट का  भरोसा है ,जनता पर  भरोसा नहीं  ।

घोषणा हो गई ’खाट’  पर चर्चा  की ।..जगह जगह खाट बिछाए जाने लगे ...जहां जहाँ  चुनाव है वहीं खाट  बिछाना है ..फ़ालतू में खाट तुड़वाने का नहीं। खाट का टेन्डर होने लगा ..सप्लाई ली जाने लगी..सप्लायर्स गदगद हो गए ...खाट पहुँचाए जाने लगे विधान सभा क्षेत्रों  में.... जनता आयेगी ..... खाट पर बैठेगी--हम. सपने बेचेंगे....मुफ़्त में पानी ...मुफ़्त में बिजली ... किसानो का कर्ज माफ़ करेंगे.... हम जानते है कि जनता ’मुफ़्त खोर’ हो गई है ..यही भुनाना है...जनता ग्राहक है  और हम सौदागर । ग्राहक देवता होता है ...देवता को आसन देना है  ,,,सो  खाट का आसन दे दिया ..आप आओ ...हमारे  वादे सुनो ...आराम से.खाट पर बैठ कर ...आधे घंटे में हमें सुनना है आप का दर्द ...आप की समस्या ..आप के कष्ट... फिर 5-साल के लिए आप निश्चिन्त हो जायें .हम आप की सेवा करेंगे अगले 5-साल तक .  ...बस समझें  कि आप का कष्ट हमारा कष्ट ..हमारा ’हाथ’-आप के साथ...न हो तो दिल्ली वालों से पूछ लें,,,,हो सकता है कि आप को मुफ़्त में कोई भाई साहब साइकिल दे.दे..मोबाईल फ़ोन दे,दे,,,लैप टाप दे दे .कोई बहन जी हाथी भी दे दें ... कुछ टट्पूजिया पार्टी मुफ़्त में दवा दारू की बोतल  भी दे.दें......विरोधी कम्पनी के झाँसे में न आइएगा . नकली माल बेचते है सब के सब  ,नक्कालों से सावधान ... नकली माल से बचें.....और आगामी चुनाव में ’हमारा ’ खयाल’ रखें ...

खाट पंचायत पूरी हुई । नेता जी उड़ कर दूसरी जगह खाट बिछाने चले गए } जनता मुँह देखती रह गई फिर वही खाट उठा कर घर ले गई ।कुछ लोग तो खाट तोड़ कर पाटी पाया भी साथ ले गए।
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 तो हे विक्रम ! अब तू मेरे सवाल का जवाब दे कि जनता  खाट लूट कर क्यों ले गई और कुछ लोग खाट तोड़ तोड़ कर क्यों ले गए । बता ..तू तो बड़ा ज्ञानी है.. न्याय करता है... न्यायी बने फिरता है ,,,
राजा विक्रमादित्य चुप रहे
;बता कि जनता  ने खाट क्यों लूटी ???? ,...जवाब दे नहीं तो तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा....
राजन सहम गए . बेताल का क्या भरोसा ...कही सचमुच ही न सर के टुकड़े कर दे ।

 अत: बोल उठे-"हे बेताल ! तो सुन ! जनता भोली थी मगर  हुशियार थी ..हर बार "पितृ-पक्ष में कौआ-पूजन"..देखती है ...राजकुमार की बातों का भरोसा नहीं  .पता नहीं राज्याभिषेक होगा भी कि नहीं ..अत: नौ नगद ,न तेरह उधार ,,,जो हाथ लगा वहीं नगद...सो जनता ने खाट लूट ली और घर चलते बनी  .एक बात और ,  5-साल ये खटमल धीरे धीरे  खटियन में घुस जायेंगे और  धीरे धीरे खून चूसेंगे।चैन से सोने भी नहीं देंगे  अत: ...’न रहेगी खाट ,न रहेगा खटमल ,न चूसेंगे  खून" -न रहेगा बाँस ,न बाजेगी बँसुरी ....

-तो फिर कुछ लोगो ने खाट क्यों तोड़ा ? -बेताल ने पूछा
-हे बेताल ! कुछ गरीब किसानों के घरों  में कई दिनों  से ’चूल्हा नहीं जला था ,सो उसे लकड़ी की ज़रूरत थी कि पेट की आग बुझाने के लिए ..चूल्हा जला सकें । भाषण से ...वादों से...नारों से .. पेट की आग नहीं बुझती ,,...चूल्हे का जलते रहना ज़रूरी है अत:  उसने खाट को तोड़ कर लकड़ी की व्यवस्था....
-हे विक्रम !तू तो बड़ा ज्ञानी है ,परन्तु  तूने एक ग़लती कर दी.... शर्त तोड़ दी,,,तू बोल उठा...और .यह ले... मैं चला उड़ कर..
..... और एक बार फिर बैताल डाल पर जा कर उल्टा लटक गया


-आनन्द.पाठक-
08800927181

रविवार, 9 अक्तूबर 2016

एक लघु व्यथा : सबूत चाहिए ...[व्यंग्य]

एक लघु व्यथा : सबूत चाहिए.....[व्यंग्य]

विजया दशमी पर्व शुरु हो गया । भारत में, गाँव से लेकर शहर तक ,नगर से लेकर महानगर तक पंडाल  सजाए जा रहे हैं ,रामलीला खेली जा रही है । हर साल राम लीला खेली जाती है , झुंड के झुंड लोग आते है  रामलीला देखने।स्वर्ग से देवतागण भी देखते है रामलीला -जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी" की । भगवान श्री राम  स्वयं सीता और लक्षमण सहित आज स्वर्ग से ही  दिल्ली की रामलीला देख रहे हैं और मुस्करा रहे हैं -  मंचन चल रहा है !। कोई राम बन रहा है कोई लक्ष्मण कोई सीता कोई जनक।सभी स्वांग रच रहे हैं ,जीता कोई नहीं है।स्वांग रचना आसान है ,जीना  आसान नहीं। कैसे कैसे लोग आ गए हैं इस रामलीला समिति में । कैसे कैसे लोग चले आते है  उद्घाटन करने । जिसमें अभी ’रावणत्व’ जिन्दा है वो भी राम लीला में चले आ रहे हैं  ’रामनामी’ ओढ़े हुए ।...लोगो में ’रामत्व’  दिखाई नहीं पड़ रहा है ।फिर भी रामलीला हर साल मनाई जाती है ...रावण का हर साल वध होता है  और  फिर  पर्वोपरान्त जिन्दा हो जाता है । रावण नहीं मरता। रावण को मारना है तो ’लोगो के अन्दर के रावणत्व’ को मारना होगा ...रामत्व जगाना होगा...
भगवान मुस्कराए

इसी बीच हनुमान जी अपनी गदा झुकाए आ गए और आते ही भगवान श्री राम के चरणों में मुँह लटकाए  बैठ गए। हनुमान जी आज बहुत उदास थे। दुखी थे।
आज हनुमान ने ’जय श्री राम ’ नहीं कहा - भगवान श्री राम ने सोचा।क्या बात है ?  अवश्य कोई बात होगी  अत: पूछ बैठे --’ हे कपीश तिहूँ लोक उजाकर  ! आज आप दुखी क्यों  हैं ।को नहीं जानत है जग में कपि संकट मोचन नाम तिहारो  । आप तो स्वयं संकटमोचक हैं ।आप पर कौन सी विपत्ति आन पड़ी  कि आप दुखी हैं ??आप तो  ’अतुलित बलधामा’ है आज से पहले आप को कभी  मैने उदास होते नहीं देखा ।क्या बात है हनुमन्त !
भगवान मुस्कराए

-अब तो मैं  नाम मात्र  का ’अतुलित बलधामा’ रह गया ,प्रभु ! बहुत दुखी हूं । इस से पहले मै इतना दुखी  कभी न हुआ ।। कल मैं धरती लोक पर गया था दिल्ली की राम लीला देखने । वहाँ  एक आदमी मिला......सबूत मांग रहा था.....
अरे!  वही धोबी तो नही था अयोध्या वाला ?- भगवान श्री राम ने बात बीच ही में काटते हुए कहा-" सीता ने तो अपना ’सबूत’  दे दिया था..
नही प्रभु ! वो वाला धोबी  नहीं था ,मगर वह आदमी भी  काम कुछ कुछ वैसा ही करता है ..- धोता रहता है  सबको रह रह कर ।वो सीता मईया का नही ,मेरे "सर्जिकल स्ट्राईक" का सबूत माँग रहा था
""सर्जिकल स्ट्राईक" और आप ? कौन सा , हनुमान ??-भगवान श्री राम चौंक गए
 ’ स्वामी ! वही  स्ट्राईक ,जो लंका में घुस कर 40-50 राक्षसों को मारा था...रावण के बाग-बगीचे उजाड़े थे..अशोक वाटिका उजाड़ दी थी ...लंका में आग लगा दी.....  रावण के सेनापति को पटक दिया था । अब आज एक  आदमी ’सबूत’ माँग रहा है...
उधर लंका में सारे राक्षस गण जश्न मना रहे ,,,,..,नाच रहे है..... गा रहे हैं ..ढोल-ताशे बजा रहे है ..लंकावाले कह रहे हैं कि  सही आदमी है  वह ....ग़लत जगह फँस गया है ...माँग रहे हैं  उसे । कह रहे हैं  लौटा दो अपना  आदमी है....,भेंज दो उसे  इधर...
भगवान मुस्कराए

’हे महावीर विक्रम बजरंगी ”- भगवान श्री राम ने कहा -"तुम्हारे पास तो ’भूत-पिशाच निकट नहीं आवें तो यह आदमी तुम्हारे पास कैसे आ गया . ..तुम उसी आदमी की बात तो नहीं कर रहे हो ..जो हर  किसी की ’डीग्री ’ का सबूत माँगता है  --किसी का सर्टिफ़िकेट माँगता है...जो -"स्वयं सत्यम जगत मिथ्या" समझता है अर्थात स्वयं को सही और जगत को फ़र्जी समझता है --तुम उस आदमी की तो बात नहीं कर रहे हो जिसकी जुबान लम्बी हो गई थी और डाक्टरो ने काट कर ठीक कर दिया है
’सही पकड़े है ’-हनुमान ने कहा
-हे हनुमान ! तुम उसी आदमी की बात तो नहीं कर रहे हो जिसकी सूरत मासूम सी है.....
-बस सूरत ही मासूम है..प्रभु !- हाँ ..हाँ  प्रभु !वही ।........कह रहा था लंका में कोई "सर्जिकल स्ट्राईक"  हुई ही नही ।वह तो सब ’वाल्मीकि ,तुलसीदास ,राधेश्याम रामानन्द सागर का  ’मीडिया क्रियेशन’ था वरना कोई एक वानर इतना बड़ा काम अकेले कर सकता है और वो भी लंका में जा कर ...कोई सबूत नहीं है ...सारे कथा वाचको ने .पंडितों ने.....रामलीला वालों ने साल-ओ-साल यही दुहराया मगर ’सबूत’ किसी ने नही दिया । प्रभु ! अब वह सबूत माँग रहा है
 भगवन ! अगर मुझे मालूम होता कि वह व्यक्ति मेरे "सर्जिकल स्ट्राईक" का किसी दिन सबूत माँगेगा तो रावण से  ’सर्टिफिकेट’ ले लिया होता -भईया एक सबूत दे दे इस लंका-दहन का । नहीं तो  अपनी जलती पूँछ समुन्दर में ही नहीं बुझाता अपितु वही जलती हुई पूँछ लेकर आता और  दिखा देता -दे्खो ! यह है ’सबूत’
भगवान मन्द मन्द मुस्कराए और बोले--नहीं हनुमान नहीं । ऐसे तो उसका मुँह ही झुलस जाता
भगवन ! उसे अपना मुँह झुलसने की चिन्ता नहीं .अपितु सबूत की चिन्ता है ,,,अगले साल देश में कई जगह चुनाव होना है न

इस बार भगवान  नहीं मुस्कराए ,अपितु गहन चिन्तन में डूब गए...
प्रभुवर ! आप किस चिन्ता में डूब गए ? -हनुमान जी ने पूछा
हे केशरी नन्दन! कहीं वो व्यक्ति कल यह न कह दे कि ’राम-रावण’ युद्ध हुआ ही नहीं  था ,,तो मैं कहाँ से सबूत लाऊँगा ???मैनें तो ’विडियोग्राफी भी नहीं करवाई थी ।
अस्तु

-आनन्द.पाठक-

गुरुवार, 6 अक्तूबर 2016

एक लघुकथा -मुज़रिम हाज़िर हो ...[व्यंग्य[

एक लघुव्यंग्य व्यथा   : मुज़रिम हाज़िर हो....

’आनन्द.पाठक पुत्र [स्व0] श्री रमेश चन्द्र पाठक साकिन औडिहार परगना सैद्पुर जिला गाज़ीपुर वर्तमान  निवासी गुड़गाँव.....हाज़िर हो"- अर्दली ने अदालत के बाहर आवाज़ लगाई
’अबे ! शार्ट में नहीं बोल सकता  क्या..? पूरे खनादान को लपेटना ज़रूरी था क्या?-मैने विरोध जताया
’आप ने 5-रुपया दिया था क्या ? वो तो भला मनाईए कि मैने 4-पुरखों तक नहीं लपेटा-
मैने 5-रुपए थमाए और बोला-" बेटा आगे से ध्यान रखना’
’ठीक है स्साब ’
और मैं अदालत कक्ष में बने कठघरे में जा कर खड़ा हो गया
-आप का कोई वकील ?--जज ने पूछा
-नहीं ,मैं ही काफी हूँ । सच को झूठ की क्या ज़रूरत ,जज साहब !
’ठीक है। सरकारी वकील ज़िरह शुरु कर सकते है?
सरकारी वकील -’हाँ ! तो आप का नाम ?
-आनन्द पाठक-
-पिता का नाम ?
-उस अर्दली से पूछ लो जो अभी अभी आवाज़ लगा रहा था ’
मै निश्चिन्त था कि मेरे 5/- से अब अर्दली  मुँह नहीं खुलेगा
 सरकारी वकील ने कहा-’मैं आप से पूछ रहा हूँ । यह आप की साहित्यिक मंडली नहीं है कि  आप जो चाहे बोल दें लिख दें ..यह अदालत है अदालत ।यहाँ कुछ भी बोलने की स्वतन्त्रता नहीं । आप का पेशा ?
-व्यंग्य लिखना-
-मैं आप का पेशा पूछ रहा हूं }रोग नहीं’- सरकारी वकील ने कुटिल मुस्कान लाते हुए पूछा
-तो आप डाक्टर हैं क्या ?-
-अच्छा ! तो आप व्यंग्य लिखते हैं - तो आप व्यंग्य क्यों लिखते है
-कि समाज को आईना दिखाना है
- समाज को आईना क्यों दिखाना है ?समाज से बिना पूछे आईना दिखाने से अनधिकॄति ’ट्रेसपासिंग’ का केस बनता है। जज साहब नोट किया जाए
-कि उसको अपना चेहरा नज़र आए
-तुम्हे मालूम है समाज अपना विभत्स और कुरूप चेहरा देख कर डर भी सकता है,.... तुम समाज में डर फैला रहे हो-इस प्रकार से आतंक फैलाने से तुम्हारे ऊपर ’आतंक’ फ़ैलाने का केस बनता है-जज साहब नोट किया जाए
-नहीं वो डरता नहीं है ,हँसता है  ,वो समझता है कि इस आईने में उसका चेहरा नहीं ,किसी और का चेहरा है
-तुम्हें मालूम है कि तुम्हारे इस तरह आईना चमकाने से कुछ लोगों की आँखे चौधियाँ गई ....कुछ लोग अन्धे भी हो गए है ..जमीर धुँधला गया है अब उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई देता ,,न भ्रष्टाचार..न बेईमानी..न भाई भतीजावाद,न सदाचार ,,न अपना कुरूप चेहरा...इस तरह से तुम समाज में वि्कृति फैला रहे हो? अन्धों को भी आईना दिखाते हो क्या ??
-नहीं । अन्धी क़ौम को आईना दिखाने का कोई लाभ नहीं
-तो इस का मतलब  तुम ’हानि-लाभ’ देख कर लिखने का व्यापार करते हो ?-जज साहब नोट किया जाय ।यह आदमी  बिना ’लाईसेन्स’ लिए व्यापार करता है -इस पर "अवैध व्यापार’ का केस बनता है
-नहीं मैं लिखता हूं~
सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना  मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
-सूरत बदली क्या ? -वकील साहब ने पूछा --तुम्हारे लेखन से समाज का क्या भला हुआ क्या ...लोग पढ़ते है और कहते हैं ’मज़ा आ गया ’....क्या बखिया उधेड़ी है....क्या जम कर धुलाई की है...क्या ’लतियाया है ? पानी पिला दिया ... बस यही न ।तुम्हारे लिखने से समाज से  भ्रष्टाचार मिट गया क्या...?? समाज सुधर गया.क्या .?? नहीं न ,तो फिर क्यों लिखते हो.....
-वकील साहब !
दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा  बेक़रार

सरकारी वकील -और कौन कौन से लोग हैं तुम्हारे ’गिरोह’ में जिस से तुम्हे इस प्रकार के ’आतंकी ’कामों में मदद मिलती है
-गिरोह नहीं है ,’वर्ग’ कहिए वकील साहब ’वर्ग’ .....प्रेरणा  मिलती है ,...... बहुत हैं -  अकेले नहीं है हम ---हरिशंकर परसाई जी है...शरद जोशी जी है ..गोपाल चतुर्वेदी जी है..लतीफ़ घोंघी.....ज्ञान  चतुर्वेदी जी है ...... शौक़त थानवी कृशन चन्दर.. फ़्रिंक तौंसवी किन किन का नाम गिनाउँ.....और गिनाऊँ क्या....
-अरे भूतिए ! इन विभूतियों के नाम  अपने नाम के साथ क्यों घसीट रहा है ? ये महान विभूतियां है ..सम्मानित विभूतियाँ है ...पुरस्कॄति विभूतियां है ..ये समाज सुधारते है ..ये तुम्हारी जैसी गंदगी नहीं फैलाते....
-तो क्या हुआ ? दर्द तो एक जैसा है ....प्यास तो एक जैसी है...
-अच्छा तो पैसे के मामले में तेरी ’प्यास’ और अदानी -अम्बानी की ’ प्यास’ एक जैसी है क्या ???

आर्डर आर्डर आर्डर...जज साहब ने 3-4 बार अपना हथौड़ा ठक ठकाया -आप सिर्फ़ काम की ही बातें पूछें  फ़ालतू बातों से अदालत का वक़्त ज़ाया न करें-जज साहब ने हिदायत की
अरे वकील स्साब ! यह टटपूंजिया ही सही पर है व्यंग्य लेखक वकील स्साब ...व्यंग्य लेखक --इस से आप बहस में नहीं जीत पायेंगे--- वादी पक्ष के लोगो ने अलग से हिदायत की
आर्डर आर्डर आर्डर...जज साहब ने 3-4 बार अपना हथौड़ा ठक ठकाया --जज साहब ने कहा -हो गया ,हो गया । बहस पूरी हो गई
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जज साहब ने अपना फ़ैसला सुनाया-- ’तमाम गवाहों के बयानात को मद्दे नज़र रखते हुए और मुज़रिम के बयानात को दरकिनार करते हुए अदालत इस नतीज़े पर पहुँची है कि मुज़रिम अपने लेखन से समाज मै चेतना फैलाने की कोशिश कर रहा है इस से जनता में क्रान्ति के बीज पड़ सकते है ...जनता आन्दोलन कर सकती है ,,बगावत कर सकती है अत: ऐसे लेखकों का ’बाहर ’रहना जनहित में उचित नहीं है । साथ ही अदालत इस लेखक के व्यंग्य लेखन की ’नौसिखुआपन्ती’ और ’ कच्चापना’  के देखते हुए  और सहानुभूतिपूर्वक  विचार करते हुए ताज़िरात-ए-हिन्द की दफ़ा  अलाना..फलाना...चिलाना और .धारा अमुक अमुक अमुक ......में इसे ’अन्दर’ करती है और 3-महीने की क़ैद-ए-बा मश्श्क़त  की सज़ा देती है । तुम्हें इस सज़ा के बारे में कुछ कहना है
"हुज़ूर ..जेल में मुझे कुछ सादे पन्ने मुहैय्या कराने की इज़ाजत दी जाये-मैने  गुज़ारिश की
-मंज़ूर है
-और एक अदद ’कलम’ भी
-नहींईईईईईई........ जज साहब की अचानक चीख निकल गई ...."नहीं ,’कलम’ की इज़ाजत नहीं दी जा सकती ...’कलम’ लेखक का हथियार होता है और जेल में ’खतरनाक हथियार’ रखने की इज़ाजत नही है
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वादी पक्ष ने तालियाँ बजाई ..जज साहब की जय हो...एक और आईनादार ’अन्दर ’ गया ....साहब ने सज़ा नहीं , सज़ा-ए-मौत सुनाई है ---अगर सच्चा लेखक होगा तो 3-महीने में  "क़लम’ के बिना  यूँ ही मर जायेगा वरना तो ये भी कोई ’टाइम-पासू"-लेखक होगा

-आनन्द.पाठक-
08800927181
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रविवार, 18 सितंबर 2016

एक व्यंग्य : बे-हाल पच्चीसी कथा 1

एक व्यंग्य : बे-हाल पच्चीसी -कथा 1

[आप ने ’बेताल-पच्चीसी’ की कहानियाँ ज़रूर पढ़ी होंगी जिसमें राजा विक्रमादित्य जंगल से एक बेताल को डाल से उतार कर,अपने कंधे पर लाद कर ले चलते हैं और बेताल रास्ते भर एक कहानी सुनाते रहता है ।बेताल शर्त रखता है कि अगर राजा विक्र्मादित्य ने रास्ते कुछ बोला तो वह उड़ कर फिर डाल पर जा कर उल्टा लटक जाएगा .....

,वैसे यह सभी कहानियाँ ’यू-ट्यूब’ पर उपलब्ध है.........

अब आगे पढिए उसी ’बेताल-पच्चीसी’ की ’बे-हाल पच्चीसी"-कहानियाँ -------......]
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’विक्रू ! तू आ गया ?? मुझे मालूम था कि तू ज़रूर आएगा "-- जंगल में डाल पे उलटा लटके हुए बेताल ने कहा-" अरे विक्रू ! जिस साधु की बात में आ कर तू मुझे यहाँ लेने आया है वह साधु ’ढोंगी’ है --तू नहीं समझेगा।’
राजा विक्रमादित्य ने आश्चर्य से उस बेताल को देखा और सोचा कि कल तक तो यह बेताल राजा विक्र्मादित्य महाराज विक्रमादित्य राजन ..राजन..कहता रहता था आज इसे क्या हो गया है आज ’विक्रू...विक्रू कर रहा है? सच है किसी को 2-4-10 बार कंधे का सहारा दे तो सर चढ़ जाता है ..हो सकता है प्यार से ’विक्रू ...विक्रू ’कर रहा हो जैसे आजकल की लड़कियां दो दिन में ही अपने ’ब्वाय फ़्रेन्ड’ विभूति नारायण सिन्हा को संक्षेप मे .विभू’...विभू ...सुखदेव परसाद चौरसिया को सुख्खू...सुख्खू..करती फिरती रहती है..मैं तो फिर भी इसे सदियों से ढो रहा हूं~

राजा विक्रमादित्य ,बेताल को डाल से उतार कर चलने लगे ,,..
’विक्रू;-बेताल ने कहा--- रास्ता लम्बा है तू थक जायेगा .चल मैं तुम्हें एक कहानी सुनाता हूँ..
राजन चुप रहे
’तो सुन ’
राजन चुप रहे
....प्राचीन काल में इन्द्रपस्थ नगरी में ’केसरी खाल’ नाम का एक नेता हुआ करता था जो हमेशा ’ केसरी’ [सिंह] की’ ’खाल’ ओढ़े हुए रहता था। । वह अपने आप को ईमानदार की प्रतिमूर्ति समझता था और अपने को छोड़ , वह सारी दुनिया को चोर ..बेईमान.. भ्रष्टाचारी ...घूसखोर..कामचोर ....ठुल्ला समझता था ।उसे लगता था कि वह राजा ’हरिश्चन्द्र ’ का कलियुगी अवतार है और अब वह सभी भ्रष्टाचारियों ...घूसखोरों और ’ठुल्लों’ को जेल भेज कर ही दम लेगा । यह बात और है कि वह किसी को जेल न भेज सका मगर किसी केसरी की तरह दहाड़ता खूब था। ईमान प्रशासन की स्थापना हेतु हर बात पर धरना देने लगा एक बार तो वह अपने ही शासन के विरुद्ध ही धरना देने बैठ गया था।अब वह हर मंच से भ्रष्टाचार के विरुद्ध दहाड़ने लगा और जनता सचमुच उसे -’केसरी’ समझने लगी ।
’विक्रू ! तू जानता है वह नेता भी एक बूढ़े बाबा को अपने कंधे पर लाद कर शहर शहर घूमता था । बाबा ने भी मेरे जैसा ही एक शर्त रखा था कि हे केसरी! अगर तूने कोई पार्टी बनाई तो मैं उड़ कर अपने आश्रम चला जाऊँगा
बाबा उड़ कर अपने आश्रम चले गए....
राजन विक्रमादित्य चुप रहे..
’...हाँ तो मैं क्या कह रहा था ....हाँ वह नेता अपनी जनता का बहुत ख़याल रखता था और जनता को मुफ़्त में पानी -बिजली देने की बात करता रहता था ।कभी कभी जनता के ऊपर बोझ पड़ा कर्ज भी माफ़ करने की भी बात करता था ।वोट लेने के लिए ,गरीबों के सामने पूँजीपतियों को गालियाँ देता था और अमीरों से चन्दा लेने के लिए अमीरों के साथ पंच सितारा होटलों में ’डिनर’ करने हेतु ’टिकट बेचता था । वह रामराज्य लाने के बातें करने लगा ...सपने दिखाने लगा..जनता उसकी इन हितकारी बातों से बड़ी प्रभावित हुई कि सदियों बाद कोई नेता ,जनता का इतना हितैषी मिला है । हाय ऐसा नेता पहले क्यों नहीं पैदा हुआ .कितने अभागे थे हम । जनता ने बड़े उत्साह से प्रचंड बहुमत से उसे ’इन्द्रप्रस्थ का सिंहासन’ सौप दिया ।
अब वह नेता से राजा हो गया
उसके शासनकाल में भ्रष्टाचार खत्म हो गया...सभी घूसखोर..कामचोर झुण्ड के झुण्ड जेल जाने लगे .साथ निभाने के लिए साथ में कुछ मंत्री भी जेल जाने लगे । जनता को अब मुफ़्त में पानी मिलने लगा...मुफ़्त में बिजली मिलने लगी ...मुफ़्त में दवाईयाँ मिलने लगी...स्कूलों में फ़ीस माफ़ हो गए...जो काम पिछली सरकारों ने 20 साल में नहीं किया उसने 2 साल में कर दिया --बड़े बड़े ’होर्डिंग लगाए जाने लगे ..आंकड़े दिखाए जाने लगे ...टी0वी-विज्ञापन आने लगे पर हरे भरे खेत,,,..मुस्कराता हुआ किसान . हर हाथ को काम ..कुछ लोग सी0डी0 बनाने के काम में लग गए...-राज्य प्रगति-पथ पर निकल पड़ा अत: उसके सारे मंत्री राज्य से बाहर यात्रा पर निकल पड़े.....जनता मगन ...मच्छर मगन ...डेंगू मगन ... चिकनगुनिया मगन ..
---------
"तो हे विक्रू ! अब तू मेरे सवाल का जवाब दे कि इस के बाद भी जनता त्राहिमाम त्राहिमाम क्यों कर रही थी ....बता बता ..तू तो बड़ा ज्ञानी है..तू तो न्याय करता है.... बड़ा न्यायी बने फिरता है ,,,
राजा विक्रमादित्य चुप रहे
;बता कि जनता त्राहिमाम क्यों कर रही थी ,...जवाब दे नहीं तो तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा....
राजन सहम गए ..इस बेताल का क्या भरोसा ...कही सचमुच सर के टुकड़े ही न कर दे । अत: बोल उठे
"हे बेताल ! तो सुन ! जनता भोली थी ..नेता की बातों में आ गई और भरोसा कर प्रचण्ड बहुमत दे दिया शायद जनता को पता न था

इतना जल्दी किसी पे भरोसा न कर
जरा देर की जान-पहचान में

-तो फिर? -बेताल ने पूछा
-अब जनता को 5-साल का इन्तज़ार करना पड़ेगा
-हे विक्रू ! तूने एक ग़लती कर दी....तूने शर्त तोड़ दिया ,,,तू बोल उठा....यह ले... मैं चला उड़ कर.. अपने डाल पर
और हाँ जाते जाते एक बात और सुन ले----”ज़िन्दा क़ौमें 5-साल इन्तज़ार नहीं करती’

अस्तु

-----अथ श्री ’-बेहाल पच्चीसी’-कथायाम प्रथमोsध्याय



-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

एक व्यंग्य : वैलेन्टाईन डे.....



कल वैलेन्टाईन डे है। यानी’ प्रेम-प्रदर्शन ’ दिवस ।

अभी अभी अखबार पढ़ कर उठा ही था कि मिश्रा जी आ गए।

अखबार से ही पता चला कि कल वैलेन्टाईन डे है। बहुत से लेख बहुत सी जानकारियाँ छपी थीं  । वैलेन्टाईन डे क्या होता है ,इसे कैसे मनाना चाहिए ।मनाने से क्या क्या पुण्य मिलेगा। न मनाने से क्या क्या पाप लगेगा । कितना ’परलोक’ बिगड़ेगा कितना परलोक सुधरेगा।अगले जन्म में किस योनि में जन्म लेना पड़ेगा। इस दिन को क्या क्या करना चाहिए ,क्या क्या न करना चाहिए.\.बहुत से ’टिप्स" बहुत सी बातें । वैलेन्टाईन डे पर ये 10 बातें न करें ...ये 10 बातें ज़रूर करें ।अगले साल मिलने का वादा करे न करे इस जन्म में क्या पता उसका बाप मिलने दे या न दे। अगले जन्म में मिलने का वादा ज़रूर करें -इस से -वैलेन्टाईन प्रभावित होती है।

इधर नवयुवक नवयुवतियाँ बड़े जोर शोर से मनाने की तैयारी कर रही हैं  । अभी कल ही सरस्वती मैया की पूजा से फ़ुरसत मिली है । ज्ञान की देवी है सरस्वती मैया। कल ही ज्ञान मिला कि प्रेम से बढ़ कर कोई ज्ञान नहीं --ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। पंडित वही होगा जो ’प्रेम’ करेगा वरना उम्र भर "पंडा’[ पांडा नहीं] बना रहेगा.... वैलेन्टाईन डे की पूजा कराता रहेगा।
नई पीढ़ी ग्रीटींग्स कार्ड की ,गिफ़्ट शाप की दुकानों में घुस गई है ।शापिंग माल भर गये हैं इन नौजवानों से ,नवयुवकों से, नवयुवतियों से । कोई कैण्डी बार खरीद रहा है ,कोई गुलाब खरीद रहा है ,कोई गिफ़्ट खरीद रहा है । खरीद ’रहा है’ -इसलिए कि लड़कियाँ गिफ़्ट नहीं खरीदती ,कल उन्हें गिफ़्ट मिलना है।
 एक लड़की दुकानदार से पूछती है-:भईया ! कोई ऐसा ग्रीटिंग कार्ड है जिस पर लिखा हो--- यू आर माई फ़र्स्ट लव एंड लास्ट वन।
" हाँ है न ! कितना दे दूँ बहन?
"5-दे दो"
;बस ?’-दुकानदार ने कहा -" मगर पहले वाली बहन जी तो 10 ले गई है"
’तो 10 दे दो न’
  सत्य भी है ।कल ’प्रेम प्रदर्शन दिवस’ है तो प्रदर्शन होना चाहिए न । देख तेरे पास 5,तो मेरे पास 10
---   ---
और इधर ,भगवाधारी लोग ,हिन्दू संस्कृति के वाहक , भारतीय सभ्यता के संरक्षक अपनी अपनी तैयारी कर रहे हैं । बैठके कर रहे हैं। यह ’अपसंस्कृति’ है । इसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है ।वरना संस्कृति मिट जायेगी। डंडो मे तेल पिलाया जा रहा है।इसी से ’अपसंस्कृति’ रुकेगी। त्वरित न्याय होगा कल -आन स्पाट न्याय’ । भारतीय संविधान  चूक गया इस मामले में  सो हमने जोड दिया। हम कल खुलेआम ये नंगापन न होने देगें। जो वैलेन्टाईन डे मना रहे हैं  वो भटके हुए ,गुमराह लोग है उन्हें हम इसी डंडे से ठीक करेंगे
और पुलिस? पुलिस की अपनी तैयारी है ...जगह जगह ड्यूटी  लगाई जा रही है ...बीच पर..पार्क में ..रेस्टोरेन्ट में ,झील के किनारे ,,,बागों में.... वादियों में ...जहाँ जहाँ संभावना है ..वहाँ वहाँ ,,,किसी की ड्युटी दिल पर नहीं लगाई जा रही है ..इस दिन .दिल से प्रेम का प्रदर्शन नहीं होता ..सो पुलिस का वहाँ क्या काम?
 खुमार बाराबंकी साहब ने यही देख कर यह शे’र पढ़ा होगा...

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है  और हवा चल रही है

तैयारियाँ दोनो तरफ़ से जबर्दस्त हो रही है ...दीयों ने भी तैयारियाँ कर रखी है ,,,,हवायें भी तैयार है कल के लिए ...। फ़ैसला कल होगा
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अखबार पढ़ कर उठा ही था कि सुबह ही सुबह मिश्रा जी आ धमके। जो हमारे नियमित पाठक हैं वो मिश्रा जी से परिचित है और जो पाठक अभी अभी इस ’चैनेल’ से जुड़े हैं उनके बता दे कि मेरी हर कथा में वह अयाचित आ धमकते है और अपनी राय देने लगते हैं । अगर आप उनकी राय मान लेते हैं तो रोज़ आते हैं , नहीं मानते हैं तो हफ़्ते दो हफ़्ते में एकाध बार आते हैं ।
अपनी हर राय में प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग ज़रूर बोलते है...’ मैं वो बला हूँ जो शीशे से पत्थर तोड़ता हूँ। लगता है कि आज भी कोई न कोई पत्थर तोड़कर ही जायेंगे
आते ही आते उन्होने अपने ’शीशे’ से एक प्रहार किया
" अरे भई ! क्या मुँह लटकाये बैठे हो? कल .वैलेन्टाईन डे है ,कुछ तैय्यारी वैय्यारी की है नहीं"?
’क्या मिश्रा ! अरे अब यह उमर है ...वैलेन्टाईन डे मनाने की? बच्चे बड़े हो गये ,बाल सफ़ेद हो गये ,सर्विस से रिटायर भी हो गया ...अब  "आखिरी वक़्त में क्या खाक मुसलमाँ होंगे?’
’यार तुम्हें मुसलमान होने को कौन कह रहा है? वैलेन्टाईन डे  में बाल नही देखा जाता है  ,गिफ़्ट देखा जाता है गिफ़्ट ..उमर नहीं देखी जाती ..आल इज फ़ेयर इन ’लव’ एंड ’वार’
अखबार पढ कर मन तो था कर रहा था कि हम भी वैलेन्टाईन डे  मनाते ..हम 60 के क्यों हो गये ... हमारी जवानी के दिनों  मनाया जाता तो हम भी  5-10 वैलेन्टाईन बना कर रखते अबतक। अतीत में चला गया मैं...उस ज़माने में कहाँ होता था वैलेन्टाईन डे । पढ़्ने में ही लगा रहा...फिजिक्स...कमेस्ट्री ..मैथ। पढ़ाई खत्म हुई तो पिता जी ने एक ’वैलेन्टाईन ’ ठोंक दी मेरे सर ....35 साल से ’बेलन’ बजा रही है मेरे सर पर। यह मिश्रा बहुत काम का आदमी है कहता है वैलेन्टाईन डे मनाने की कोई उमर नहीं होती....न जाने कहाँ खो गया मैं, ख़यालों में....,
 -" अरे भाई साहब ! कहाँ खो गए ?कल .वैलेन्टाईन डे है ,कुछ तैय्यारी वैय्यारी की है नहीं"?
-यार कभी मनाया नहीं ,मुझे तो कुछ आता नहीं .. कुछ बता तो मनाऊँ
-पहले तो 1 वैलेन्टाईन होना ज़रूरी है । कोई है क्या?
-हें हें हें अरे यार इस टकले सर पे कौन वैलेन्टाईन बनेगी? 1-है तो ज़रूर जो मेरे शे’र पर  फ़ेसबुक पर वाह वाह करती है......’-मैने शर्माते शर्माते यह राज़ बताया
-" अच्छा तो तू उसे फोन मिला और कह कि कल वैलेन्टाईन डे है..........." मिश्रा जी ने अपने ’शीशे’ से दूसरा पत्थर तोड़ना चाहा
-यार मुझे करना क्या होगा ?पहले ये तो बता ’-मैने अपनी दुविधा बताई
-कुछ नहीं, बस बाज़ार से 2-4 ग्रीटिग कार्ड खरीद ले....,2-4  कैंडी बार ..2-4 कैडबरी चाकलेट  बार..2-4 गुलाब के फूल ,अध खिली कली हो तो अच्छा..2-4 पेस्ट्री ..2-4 केक ..2-4 .इश्क़िया शे’र -ओ-शायरी ....2-4...."
-;यार मिश्रा ! तू वैलेन्टाईन डे मनवा रहा है कि सत्यनारायण कथा की ’पूजन सामग्री ’ लिखवा रहा है ।
-भई पाठक जी ! वैलेन्टाईन डे भी किसी ’पूजा’ से कम नही । वो खुश नसीब होते है जिन्हें कोई ’पूजा’ डाइरेक्ट मिल जाती है
और यह 2-4 दो-चार क्या लगा रखा है?-और वैलेन्टाईन डे में ’केक’ का क्या काम ?
-कुछ आईटम रिजर्व में रखना चाहिए। एक न मिली तो दूसरे में काम आयेगा...और जब पुलिस तुम्हे डंडे मारेगी पार्क में  तो वही ’केक’ उसके मुँह पर पोत देना..भागने में  सुविधा रहेगी- मिश्रा जी ने ’केक’ की उपयोगिता बताई
-और गुलाब का फूल ’लाल’ लेना है कि ’सफ़ेद ?
-सफ़ेद गुलाब ??? -मिश्रा जी अचानक चौंक कर बैठ गए -बोले---"यार तू वैलेन्टाईन डे मनाने जा रहा है कि मैय्यत पर फूल चढ़ाने जा रहा है?
-यार मिश्रा ! शे’र-ओ-शायरी में मेरा शे’र चलेगा क्या ?
तू सुना तो मैं बताऊँ-"
मैने अपना एक शे’र बड़े तरन्नुम से बड़ी अदा से  बड़ा झूम झूम कर पढ़ा....

नुमाइश नहीं है ,अक़ीदत है दिल की
मुहब्बत है मेरी इबादत में शामिल

मिश्रा जो ठठ्ठा मार कर हँसा कि मैं घबरा गया कि कहीं शे’र का ’बहर’ /वज़न तो नही गड़बड़ा गया कहीं तलफ़्फ़ुज़ तो ग़लत तो नहीं हो गया ।
 मिश्रा जी ने रहस्योदघाटन किया कि तुम्हारे ऐसे ही घटिया शे’र से कोई वैलेन्टाईन  नहीं बनी और न बनेगी । और जो बनाने जा रहे हो सुन कर वो भी भाग जायेगी...एक काम करो...तुम शे’र-ओ-शायरी वाला पार्ट मेरे ऊपर छोड दो..... भुलेटन भाई पनवाड़ी के पास इश्क़िया शायरी का काफी स्टाक है,.... सुनाता रहता है ...कल मैं 2-4 शे’र तुम्हें लिखवा दूँगा ...
अच्छा तो मैं चलता हूँ
मिश्रा जी चलने को उद्दत हुए ही थे  कि यकायक ठहर गये..पूछा
-यार भाभी जी नहीं दिख रही है : कहीं गई है क्या :
-हाँ यार ! ज़रा 2-4 दिन के लिए मैके गई है
-मैके? और इस मौसम में? भई मैं तो कहता हूँ कड़ी नज़र रखना उन पर  । कही वो  न .वैलेन्टाईन डे मना लें मैके में~’-  कहते हुए मिश्रा जी वापस चले गये
-अस्तु-

-आनन्द.पाठक
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