रविवार, 14 फ़रवरी 2021

एक व्यंग्य 80 :वैलेन्टाइन डे-3

 एक व्यंग्य व्यथा :  वैलेन्टाइन डे -3

 इस 3- से आप ’पानीपत का "तीसरा" युद्ध न समझ लें । हालाँकि नव संस्कृति के नए दौर में  ’वैलेन्टाइन डे" मनाना किसी पानीपत के युद्ध से कम भी नहीं  ,

जहाँ एक तरफ़ नए नए प्रेमी जोड़े लड़के-लड़कियाँ -दूसरी तरफ़ संस्कृति के ठेकेदार. प्रशासन, पुलिस और बीच में पानीपत का मैदान ।

 2-वैलेन्टाइन डे मना चुका हूँ -मगर शहीद न हो सका ]

14-फ़रवरी ।

आज वैलेन्टाइन डे है ।प्रेम का प्रतीक -प्रेम दिवस। दो दिन बाद सरस्वती पूजा है । ज्ञान का प्रतीक, ज्ञान दिवस ।

वैलेन्टाइन डे हमेशा 14-फ़रवरी को ही पड़ता है । लगता है यह दिन उतना ही अटल है, सत्य है, शाश्वत है, जितना "प्रेम’।

परन्तु ज्ञान दिवस [सरस्वती पूजा] ’14-फ़रवरी से कभी पहले आ जाता है,कभी बाद में । इस साल प्रेम  पहले आ गया.ज्ञान बाद में आएगा।

ज्ञान और प्रेम में कोई न कोई संबंध अवश्य है । ज्ञान होता है  तो प्रेम उपजता है  प्रेम हुआ तो ज्ञान । गोपियों को जब  ज्ञान उपजा,

तो उद्धव जी  फ़ेल हो गए} मगर जब ’प्रेम’ असफल’ होता है तो ज्ञान -चक्षु खुलता है ।मेरा तो कई बार खुल चुका है। मत पूछना कैसे ?

हम" वैलेन्टाईन डे" मनाते है इसलिए कि अंग्रेज  मनाते हैं ।हम उनसे कम है क्या ?  हमारे यहाँ उस स्तर का कोई "वैलेन्टाइन"  पैदा ही नहीं हुआ। लैला- मज़नूँ ,सीरी-फ़रहाद,सोहनी-महीवाल

यह सब तो किस्से है, पढ़ने के लिए  सोनपुर के मएला में  ददरी के मेला में ,नाटक खेलने के लिए , मेला में नौटंकी करने के लिए ।इसीलिए बहुत से लड़कियाँ आज भी  इस स्तर के  प्रेम को ’नौटंकी’ ही मानती  है । 

इन देसी किस्सों में वह उत्सर्ग कहाँ जो वैलेन्टाइन वाले किस्से में है-निस्वार्थ और निश्छल-माडर्न,एडवान्स ,हाइ क्लास का प्रेम। ,

वह तो भला हो पश्चिमी देश वालों का .अंग्रेजों का, जो बता दिया कि वैलेन्टाइन का प्रेम सबसे बढ़ कर-शुद्ध- सात्विक ।तुम लोग भी मनाया करो, सो मनाते है प्रेम भाव से।

इस दिन,  नई फ़स्लों पर ,नई पौध पर बहार आ जाती है। या कहिए छा जाती है ।झूमने लगते है ।आपस में गले मिलने लगते है लड़के-लड़कियाँ।

पहले मैं भी  झूमता था। बाग़ों में ,तितलियाँ पकड़ता था ।एक महीना पहले से ही जुगाड़ में लग जाता था । आने वाले परीक्षा की चिन्ता नहीं करता था। वैलेन्टाईन डे की चिन्ता ज़रूर करता था। अगर इसमे पास हो गए तो

समझो लाइफ़ बन गई ,अगर वह ’वाइफ़’ न बनी तो । नकल कर करा के इक्ज़ाम पास कर के भी  क्या करेंगे--ज़्यादा से ज़्यादा क्लर्की करेंगे। फिर वही जीवन घसीटना।

बाग में  बैठा कर "उसको"  समझा रहा था --- तुम कहॊ तो आसमान से चाँद-तारे तोड़ कर ला सकता हूँ --- तुम कहॊ तो तुम्हारे लिए जान भी दे सकता हूँ ,-तुम कहो हवा का रुख मोड़ सकता हूँ

तुम कहो तो----तुम कहो तो----हम दोनो का -- एक छोटा सा बँगला बनेगा, न्यारा,कोठी बँगला गाड़ी  होगा --,कुत्ता- होगा --

"कुत्ता" ? -बीच ही में बोल उठी वह।--नहीं जानूऽऽऽऽ  ! तुम्हारे रहते कुत्ते की क्या ज़रूरत ?

"हें हें हें --तू भी अच्छा मज़ाक कर लेती है" --मैने अपनी बत्तीसी निपोरी।

"जानती हो ! हम लोग स्विटजरलैंड चलेंगे शादी के बाद हनीमून पर " -मैने उसे समझाया-- स्विटजरलैंड देखा है ? मैने सीना चौड़ा कर के पूछा ।

"हाँ जानती हूँ।हर साल कोई न कोई  तेरे जैसा निठल्ला  ’स्विटजर लैंड ले जाता है मुझे ।"

 अभी सपने बुन ही रहा था कि किसी ने  पीठ पर अचानक एक डंडा जमा दिया --बिलबिला कर मुड़ कर देखा  पीछे मूछें ताने पुलिसवाला खड़ा है।

मैं हड़बड़ा कर बोल उठा --"सर कजिन है, मेरी कज़िन सिस्टर  "

स्साले !मुझको चराता है । मैं भी अपनी जवानी में ऐसे ही कज़िन सिस्टर घुमाया करता था ।चल थाने !

एक डंडे से ’रिश्ते’ कैसे बदल जाते हैं ।

ख़ैर ,ले देकर मामला रफ़ा दफ़ा हो गया। मगर वो भाग गई ।

 अब मैं उसे ढूँढने निकला । किधर गई होगी ? किसके साथ भागी होगी? कहीं ’स्विटजरलैंड’ तो नहीं चली गई?

मैं दिन भर उसे ढूँढता रहा । मगर वह न मिली ।

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मिश्रा जी ने आते ही आते पूछा --"अब पीठ का दर्द कैसा है ?"

पीठ? किसकी पीठ ? कैसी पीठ ?-कैसा दर्द ? -मैने आश्चर्य भाव से पूछा। 

"बड़े मियाँ दीवाने ऐसे न बनो !-मिश्रा ने जिगर मुरादाबादी का एक तरमीम शुदा शे’र पढ़ा 

"जिगर" तू ने छुपाया लाख अपना दर्द-ओ-ग़म लेकिन

बयाँ कर दी तेरी सूरत ने सब कैफ़ियतें  दिल की 

"भाग गई न ? साल भर का दिन बर्बाद हो गया न । मियाँ ! बिना ’स्टेपनी’ के गाड़ी चलाओगे तो ऐसा ही होगा। मेरा देखो -मैं दो-दो ’स्टेपनी’  साथ लेकर चलता हूँ । एक भागी ,दूसरी हाजिर।

प्रभु ! आप के चरण किधर है ?-मैने कहा।

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अब तो एक ज़माना हो गया वैलेन्टाइन डे मनाए हुए।


जब से  श्रीमती जी को वैलेन्टाईन डे के पीछे का "खेल" और ’रहस्य’ मालूम हो गया  तब से  आज के वह मुझे कैद-ए-बा मशक़्क़त की सज़ा दे देती हैं। 

आज 14-फ़रवरी है । आज कहीं आने -जाने को नी । नो बाग़-बगीचा ,नो गार्डेन ।सर में जास्ती तेल-फ़ुलेल लगाने को नी ।आज नो रोमान्टिक शे’र-ओ-शायरी ।  घर बैठो --गीता पढ़ो --रामायण पढ़ो ।’राम-धुन ’ गाओ --

आँखें नीची ,आवाज़ ऊँची --

मित्रो ! आज 14-फ़रवरी है और मैं रामायण की चौपाइयाँ पढ़ रहा हूँ ।जोर जोर से पढ़ रहा हूँ ।

बरु भल बास नरक कर ताता। 

दुष्ट संग जनि देइ बिधाता॥

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नाम "लंकिनी’ एक निसचरी । सो कह चलसि मोहिं निंदरी ॥

 स्वामी आनन्दानन्द जी महराज कहते भए- घर में --

’त्रिजटा नाम राक्षसी एका ।--------

 प्रेम से  बोलो ’त्रिजटा’ मइया की जै ! वैलेन्टाइन महराज की जै ।

-आनन्द.पाठक-

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 15 जनवरी 2021

एक व्यंग्य 79 : दीदी ! नज़र रखना

 

एक हास्य-व्यथा  : दीदी ! नज़र रखना

 

"ट्रिन! ट्रिन !ट्रिन !-फोन की घंटी बजी और श्रीमती ने आदतन फ़ोन उठाया।

कहते हैं श्रीमती जी फ़ोन सुनती नहीं, ’सूँघती’ है और समझ लेती हैं कि किसका  होगा।

"हाँ  बिल्लो बोल  !"

"क्या दीदीऽऽ! तुम भी न! अरे ;बिल्लो नहीं --बिट्टो बोल रही हूँ।बिट्टो।

;अरे हाँ रे  । तेरे "टुल्ले" जीजा को "लुल्ले " बोलते बोलते ’ट’ को ’ल’ बोल जाती हूँ न।हाँ बोल ।

" दीदी, मेरी बातें ध्यान से सुनना। आजकल जीजा के चाल चलन ठीक नहीं लग रहा है। तुम  तो ’फ़ेस बुक’ पर हो

नहीं। मगर मैं उनका हर पोस्ट पढ़ती हूँ । जाने किसे कैसे कैसे  गीत ग़ज़ल पोस्ट कर रहे हैं आजकल।मुझे तो  दाल में

कुछ काला लग रहा है ।  हाव भाव ठीक नहीं लग रहा हैउअनका। पिछले महीने एक रोमान्टिक गीत पोस्ट किया था ।

लिखा था-

खोल कर यूँ न ज़ुल्फ़ें चलो बाग़ में

प्यार से है भरा दिल,छलक जाएगा

 

 ये लचकती महकती हुई डालियाँ

 झुक के करती हैं तुमको नमन, राह में

 हाथ बाँधे हुए सब खड़े फ़ूल  हैं

 बस तुम्हारे ही दीदार  की  चाह में

 

यूँ न लिपटा करों शाख़  से पेड़  से

मूक हैं भी तो क्या ? दिल धड़क जायेगा

 

पता नहीं किसको घुमा रहे हैं  गार्डेन में,आजकल ?

 

’अरे ! ऊ का घुमायेंगे किसी को, कंजड़ आदमी । मुझे तो कभी घुमाया नहीं "--श्रीमती जी ने प्रतिवाद किया

और मैंने चैन की साँस ली ।

 

बिट्टो ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा-"कल एक गीत पोस्ट किया है जीजा ने" । लिखा है

 

कैसे कह दूँ कि अब तुम बदल सी गई

वरना क्या  मैं समझता नहीं  बात क्या !

 

  एक पल का मिलन ,उम्र भर का सपन

  रंग भरने का  करने  लगा  था जतन

  कोई धूनी रमा , छोड़ कर चल गया

  लकड़ियाँ कुछ हैं गीली बची कुछ अगन

 

कोई चाहत  बची  ही नहीं दिल में  अब

अब बिछड़ना भी  क्या ,फिर मुलाक़ात क्या !

वरना क्या मैं समझता----

 

लगता है जिसको घुमा रहे थे ,वो छॊड़ कर भाग गई । कभी कभी फ़ेसबुक भी चेक कर लिया करो इनका।

मुझे तो कुछ लफ़ड़ा लग रहा है । ज़रा कड़ी नज़र रखना जीजा पर ।

 

" हाँ बिट्टो ! मुझे भी कुछ कुछ ऐसा लग रहा है ।पिछले हफ़्ते बाथरूम में एक फ़िल्मी गाना गा रहे थे।

 

किसी राह में ,किसी मोड़ पर

 --कहीं चल न देना तू छोड़ कर । मेरे हम सफ़र ! मेरे हम सफ़र

 

किसी हाल में ,किसी बात पर

कहीं चल न देना तुम छोड़ कर---मेरे हम सफ़र ! मेरे हम सफ़र !

 

पता नही किस को छोड़ने की बात कर रहे थे।

मैने टोका भी आजकल बड़े गाने बज़ाने हो रहे हैं जनाब के तो ।

बोले कितना सुन्दर गाना है।।मैने पूछा कौन ? , गाना ? कि गानेवाली ?

तो कहने लगे कि तुम्हारे दिमाग़ में  तो कचड़ा भरा है ।मोदी जी को एक सफ़ाई अभियान इधर भी शुरु

कर देना चाहिए ।

अभी कल ही एक गाना  सुना उनका ।आँख बन्द कर बड़े धुन में गा रहे थे।

 

-ऎ मेरे दिल-ए-नादाँ--तू ग़म से न घबराना

इक दिन तो समझ लेगी --दुनिया तेरा अफ़सान

 

मुझे भी कुछ ठीक नहीं लग रहा है,आजकल । पता नहीं कौन सा अफ़साना दुनिया को समझा रहे थे।

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बिट्टो ने अपनी लगाई बुझाई जारी रखते हुए कहा--" !कल ही जीजा का एक पोस्ट देखा था,लिखे थे।

 

जब से छोड़ गई तुम मुझको

सूना सूना  दिल का कोना ।

साथ भला तुम कब तक चलती

आज नहीं तो कल था होना ।

 

दीदी !’इनके’ दोस्त कह रहे थे कि सरकारी सेवा से रिटायर हुआ आदमी खुल्ला सांड  हो जाता है ।गले से ’Conduct Rules ’ का  पगहा Rules 14,16 का फ़न्दा  छूट जाता है|
सारे बुड्ढे कहते हैं कि मस्ती की जिन्दगी तो 60 के बाद शुरु होती है।हमे तो डर लग रहा है कि जीजा कहीं नई ज़िन्दगी न शुरु कर दें 

 

"अरे ! तू चिन्ता न कर बिट्टो ! ये लिखना पढ़ना गाना बजाना  जितना कर लें। मगर जा कहीं नही  सकते ।कुछ तो ’करोना’ ने क़ैद कर दिया,

कुछ मैने ’क़ैद-ए-बा मशक़्कत ’ कर दी है॥ मटर छिलवाती हूँ ,प्याज कटवाती हूँ ।कभी कभी तो ’झाड़ू पोछा’ भी करवा लेती हूँ इन से।

 "पर कटा पंक्षी" बना दिया है इनको । " पर कटा पक्षी " फ़ुद्क तो सकता है उड़ नहीं सकता ।

 

अरे! तो कहीं फ़ुदकते फ़ुदकते ही न निकल जाए _-- कह कर बिट्टो ने फ़ोन रख दिया ।छ

 

-आनन्द.पाठक-