रविवार, 26 दिसंबर 2021

एक व्यंग्य 83 : चुनाव और यक्ष प्रश्न

  एक व्यंग्य : चुनाव और यक्ष प्रश्न


रेडियो पर गाना बज रहा है -


कलियों ने घूँघट खोले

हर फ़ूल पे भौरें डोले

लो आया प्यार का मौसम, गुलो गुलजार का मौसम ।


भारतीय़ लोकतन्त्र में गुलो गुलजार का मौसम तो नहीं आता , चुनाव का मौसम ज़रूर आता है। 

कलियाँ कौन ? 

18 साल की उम्र को कली कह रहे होंगे । स्वीट 18-’एट्टीन’। शायद नई पीढ़ी । 

वोट देने की उम्र हो गई यानी घूँघट खोलने की उम्र हो गई । सुना है शादी के बाद घूँघट खोलने की उम्र 21 साल होने वाली है।

कहते हैं 21-साल की उम्र में अपना भला बुरा सोचने की क्षमता आ जाती है । मगर वोट देने के लिए कौन सी क्षमता ? कौन सा सोच समझ कर वोट देना है। 

जब धर्म के नाम पर, मज़हब के नाम पर, मन्दिर - मसजिद के नाम पर ही वोट देना है  ,जात-पात के नाम पर ही वोट देना है तो इसमे सोचना क्या है।

18-साल की उम्र काफी है ।


अभी 5- राज्यों में चुनाव होने वाला है । उत्तरप्रदेश में भी होने  वाला है। हर बार ’उत्तम ’ प्रदेश  बनाने की बात होती है।हर बार प्रदेश "उत्तरापेक्षी" हो जाता है। 

फूलों पर भौरें ? 

भौरें तो वह जो हर 5-साल बाद  चुनाव के मौसम में आ जाते हैं  -टोपी लगाए। कोई लाल टोपी ,कोई नीली टोपी , कोई भगवा  कोई हरी टोपी लगाए।

यदा कदा ’गाँधी टोपी’ वाले भी आ जाते हैं । ज़रूरी है ।  चुनाव में कलियों को,  ’ फूलों’ को टोपी पहनाना है ।

फूल कौन ? जनता।

 जनता, हमेशा फूल बनी रहती है । भौरे मडराते रहते हैं । जनता का क्या । जनता, चुनाव के पहले  भी ’फूल’।  चुनाव के बाद  भी- ’फूल’ [ Fool ]

 और यही ’फूल’ बाद में  भौरों के इर्द-गिर्द मडराते  हैं।

 ओवैसी साहब तो ख़ैर अपने को "भौरा" नहीं ,’लैला’ कहते है -मगर काम ’भौरें’ वाला ही करते हैं ।


चुनाव में जनता नहीं आती -नेतागण आते हैं ।

कोई "लालटेन’ लेकर आता है-कहता है --मूढ़ ! लालटेन की रोशनी में आ । देख कैसे इसी लालटेन से मैने अपना  और अपने परिवार का अँधेरा दूर किया। ग़रीबी दूर किया । तू लालटेन 

लेकर भी ढूँढेगा तो भी ऐसा चमत्कार न मिलेगा।

कोई ’साइकिल’ पर आ रहा है ,कोई ’हाथी’ पर । कोई ’हाथ’ दिखाते आ रहा है कोई ’झाडू" लिए ।-देख इसी झाडू से तेरी गरीबी दूर करेंगे।

कोई "कमल" का फूल लिए दौड़ रहा है -जनता को ’प्र्पोज’ करना है -कोई और न प्रपोज कर दें हम से पहले। 

सभी जल्दी में है । जनता को टोपी पहनाना है, सपने दिखाना है। जनता मगन ह्वै सपने देख रही है । ’बुधना’ -समाज के अन्तिम छोर पर खड़ा आदमी-भी सपने देख रहा है 

। सुहाने सपने ,रंगीन सपने, हर रंग के सपने । पेट भूखा है तो क्या! सपने देखने में कौन सी मनाही और देखने में कौन सा पैसा लगता है ।"ढपोर शंख" ही तो बनना है ।

बुधना देख रहा है -कोई मुफ़्त में ’स्कूटी’ दे रहा है --कोई ’लैपटाप। कोई खाते में हज़ार हज़ार रुपया डाल रहा है । बुधना उछल रहा है। कर्जा माफ़ हो जायेगा।

भइया बोल गए हैं । कितना खयाल रखते हैं हमारी गरीबी का।

एक भाई साहब तो --चुनाव कहीं हो-कभी  हो -बस पानी-बिजली मुफ़्त में  हैं । बिल माफ़ करते फिरते रहते है। "राजकोष’ खाली कर देते है तो रोने लगते है--केन्द्र सरकार हमारी मदद नहीं कर रही है

गरीबों के हक का पैसा खा रही है।

--बुधना को सपने में खोया देख, मैं भी सपने देखने लग गया।

देखा सपने में ’यक्ष’  प्रगट हो गया। वही यक्ष जो युधिष्ठिर के चारों भाइयों को "मुआ" दिया था। युधिष्ठिर को थका दिया था ।


मैने कहा--’महराज ! अब कौन सा प्रश्न बाकी रह गया जो आप मुझसे पूछने आ गए?

यक्ष -ठहर ! तू चुनाव का टिकट चाहता है तो फ्हले मेरे प्रश्नों का उत्तर दे ।

मैं -    पूछिए

यक्ष- सत्य क्या है ?

मैं- कुरसी ।

यक्ष-परम सत्य क्या है ?

मैं - CM /PM की कुरसी ।

यक्ष- सबसे पड़ा झूठ क्या है ?

मैं- खाते में 72000/- 72000/- रुपए  का आना ।

यक्ष- मूर्ख कौन?

मैं --भोली जनता

यक्ष -- ईमानदार कौन ?

मैं-- मफ़लर वाला ।

यक्ष- सबसे  बड़ा आश्चर्य क्या ?

मैं - --कि हर ’तथाकथित नेता’ हर दूसरे रोज़ अन्दर के परिधान की तरह अपने रंग के साथ साथ अपनी टोपी का भी रंग बदल लेता है। एक पार्टी के बिल से निकलता है

दूसरी पार्टी के बिल मे घुस जाता है, बिक जाता है । फिर भी कहता है कि वह ’उसूलों ’ से समझौता नहीं करता। वह हम ग़रीबों की ग़रीबी दूर करने आता है और अपनी ग़रीबी दूर कर जाता है।

जनता को "कुर्ते का ’फटा जेब’ दिखाता है और करोड़ो का मालिक बन जाता है ।इससे बड़ा आश्चर्य और क्या  कि जब उसकी ’आत्मा’  मर जाती है और ’शरीर’ दूसरी पार्टी में घुस जाता है जिधर मलाई उधर भलाई।

यक्ष ---बस बस , रहेण दे पगले ! रहेण दे। अब रुला ही देगा क्या ? तेरे उत्तर से मैं अति प्रसन्न हुआ । बोल किस चुनाव क्षेत्र का टिकट दे दूँ ?

मैं - हे महोदय  ! आप यक्ष तो नहीं हो सकते। यक्ष को टिकट बाँटने का अधिकार नहीं होता । टिकट बाँटने ,  बेचने  का अधिकार तो ’हाइ-कमान का होता है । कृपया अपना परिचय दें 

कि आप कौन हैं "

यक्ष - हा हा हा । मैं हाइकमान ही हूँ । बोल कहाँ का टिकट दे दूँ ?

मैं - मगहर से ।

यक्ष - मगर क्यों ? काशी क्यों नहीं ?

मैं -  काशी से जमानत जब्त करानी है क्या !

---     ---  --  ==

"क्या नींद मे ’मगहर- काशी, मगहर-काशी  बड़बडा रहे हो। सुबह हो गई ,उठना नहीं है क्या ? आज बरतन धोना नहीं है  क्या ?"  --देखा श्रीमती जी -आप - पार्टी का  निशान "झाडू" हाथ में लिए खड़ी है।

सपना टूट गया । टूटे सपने का फलाफल  क्या ।


अस्तु


-आनन्द.पाठक-

[ मुखौटे ही मुखौटे-से]

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें