मंगलवार, 6 अक्तूबर 2020

एक व्यंग्य 70 : ग्लीसरीन के आँसू

 

 

एक व्यंग्य व्यथा : ग्लीसरीन के आँसू

 

 

" आइए आइए पाठक जी ! बड़ी लम्बी उमर है आप की ।आप ही को याद कर रहा था"-मिश्रा जी ने अपने ड्राईंग रूम  सोफ़े में धँसे धँसे स्वस्तिवाचन और आशीर्वचन किया। देखा कि वह टी0वी0 देख रहे थे।

 

"देखिए पाठक जी ! क्या हॄदय विदारक दॄश्य है -मजदूरों के पलायन का । प्रवासी मजदूरों का । पैदल ही  चल दिए गाँव की ओर --हज़ारों मील का सफ़र

-देखा नहीं जा रहा है ।छोटे छोटे बच्चे  -माँ की गोद में ,पिता के कंधे पर , एक बच्चा तो ट्राली वाले सूट्केस पर लेटा हुआ चला जा रहा है ।

भूखे नंगे चले जा रहे है इस तपती सड़क पर । पाठक जी यह देखिए कैसे एक बच्ची अपने पिता को साइकिल

पर बैठा कर अपने गाँव ले जा रही है ---शीश पगा न झगा तन पे --भूखे प्यासे लोग - " "बायीं " कोहनी पर टिके हुए।जब ’वाम पन्थी ’ विचारधारा जोर मारती है तो

बाय़ीं कोहनी पर टिक जाते है । कहते हैं -पाठक जी सूरज की धूप और सर्वहारा की भूख इस दुनिया को झुलसा सकती है ।

 वह टी0वी0 के फ़्रेम दर फ़्रेम दृश्य समझा ही रहे थे कि अचानक

बिजली चली गई ।पावर कट हो गया ।-

 

-" लो पावर’ चला गया ! ये पावर कम्पनियाँ भी न॥ साल भर का बदला इसी गरमी में  लेती है ।हर साल बिजली का रेट 

बढ़ा देते है और  देने के नाम पर  घंटा । कितनी उमस है आज । और यह गरमी कि बस आग ही बरसा रही है ।झुलसा रही है ।

’ बेटा बबलू ! ज़रा इन्वर्टर तो चालू कर दे बेटा --ज़रा पंखा तो चले !--अब "दाएँ " पर कोहनी  पर टिके टिके  मिश्रा जी ने आवाज़ लगाई।

जब ’दक्षिंण पन्थी ’ विचारधारा जोर  मारती है तो  दायें कोहनी पर टिक जाते हैं
जब किसी कोहनी पर नहीं टिके होते हैं--तो हवा का ’रुख’ देखते है कि किस साइड कोहनी टिकाना ठीक रहेगा।

 

’पापा ! इन्वर्टर बैठा हुआ है । बैटरी चार्ज नही हुआ है ।--बेटे ने घर के अन्दर से आवाज़ लगाई

’ लगता है ये बिजली वाले जान लेकर ही छोड़ेगे मेरा’--चलिए तबतक ’आप को इन प्रवासी  मजदूरों पर एक कविता सुनाते है । ’- मिश्रा जी ने

अपना भार ’बाएँ’  कोहनी पर टिका दिया ।

 

’पाठक जी ! ये मजदूर भी क्या जीवट वाले है ? सुनिए

 

-पैरों में इनके छालें हैं

-क्या ये भी जीवट वाले है

-भूखे पेट चले घर को

-न पैसे हैं ,न निवाले है

 

कविता सुनाने के बाद ,मिश्रा जी के चेहरे पर एक ’आत्म-मुग्धता ’ का भाव उभर आया । बड़े कातर नयनों से मुझे देखा कि मैं ’वाह वाह ’ कर दूँ

कुछ तालियाँ बजा दूँ --

 

 मैं अब चलने को उद्दत हुआ तो मिश्रा जी ने टोका --कहाँ चले महराज ! एक और कविता सुनते जाओ इन मजदूरों की बेबसी पर --"

’बाद में कभी सुन लूँगा ’

कनखियों से देखते हुए व्यंग्यात्मक भाव से मिश्रा जी ने  चार लाइन और सुना दीं

 

" जो भरा नहीं है भावों से 

जिसमें बहती रसधार नहीं

वह हृदय नहीं है पत्थर है

जिसमें प्रदेश  से  प्यार नहीं

 

- भाई साहब ! प्रदेश नहीं --वह स्वदेश है स्वदेश ’- मैने आपत्ति जताई

-सही पकड़ा  !

 भई मिश्रा जी !  मुझे कवि फ़लाना सिंह के पास भी जाना है कविता सुनने । उनके ह्रुदय में भी आप जैसी ’रसधार ’ बह रही है ।

सुना सर्वहारा वर्ग के पोषक है ।

-अरे ऊ का कविता सुनाएगा ! फ़ेस बुक से चुराता है । ’चोट्टा कहीं का ।-"देखें कह दे कोई इस सेहरे से बढ़ कर सेहरा "

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मैं बाहर निकल आया ।

 

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ठीक ही कहा है  किसी ने 

 

कोहनी पर टिके हुए लोग,

सुविधा पर बिके हुए लोग।

करते हैं बात बरगदों की

गमले में उगे हुए लोग!!

 

अस्तु


 

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