शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

एक लघुव्यथा : अन्तरात्मा की पुकार

एक लघु व्यथा: अन्तरात्मा की पुकार ...[व्यंग्य]

--’अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़   ’ ’फ़लाना पार्टी में शामिल हो गए।

      बीती रात जब वो सो रहे थे तो उनकी अन्तरात्मा एकाएक जाग गई । ऐसी ही  अन्तरात्मा एक बार बाबू जगजीवन राम जी की भी जगी थी कि कांग्रेस छोड़ दिया था और तब से  ’आया राम ,गया राम, चल पड़ा।तत्पश्चात कई लोगों की अन्तरात्मा जगने लगीऔर वोअपना दल छोड़ सामने वाले दल में जाने लगे इस उम्मीद से कि वहाँ उनकी अन्तरात्मा को कोई पद मिल जाये...कुर्सी मिल जाए  तो आत्मा को   शान्ति मिल जाए। एक मित्र ने पूछा -जब कोई पुरुष दल-बदल करता है तो ’आया राम गया राम’ कहते हैं परन्तु जब एक महिला नेत्री दल बदल करती है तो उसे क्या कहते हैं ? मैने कहा "--आई रीता,गई गीता । रीता माने ’खाली’, हाथ कुछ भी नहीं ।-कई वर्षों तक पार्टी की अथक सेवा करने के बाद भी कोई लाभकारी पद न मिले ...मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिले ...किसी संस्था का अध्यक्ष पद न मिले तो ’आत्मा’ बेचैन हो जाती है  और जग जाती है ।  उनकी  आधी रात को जग गई । कोसने लगी ’-हे मूढ़ पुरुष !  ।  एक ही पार्टी की विचारधारा वर्षों से धारण करते करते तेरे वस्त्र मैले हो गए ..जीर्ण-शीर्ण हो गए -यत्र तत्र से फट फटा गए हैं जिस समाजवाद को तू सीने से चिपकाए  फिरता है वो तो छ्द्म समाजवाद है .तेरा समाजवाद तेरे घर से उठ कर तेरे भाई ,तेरे पुत्र ,तेरी पुत्र-वधू ,तेरे भतीजे ,तेरे भांजे तेर साले से घूम फिर कर तेरे नाती पोतो तक  आ जाता है ।क्या तेरा ’सेक्यूलिरजम’ झूठा नहीं है? छद्म नहीं है ? रोज़ा में इफ़्तार पार्टी  देता है , अयोध्या में ’हनुमान गढ़ी जाता है.....  गुरुद्वारा में सरोपा ग्रहण करता है .... वोट बैंक में सेंध लगाता है ...किसलिए ..कुर्सी के लिए न .।क्या ..तेरा सर्वधर्म समभाव ..... का नारा कुर्सी के लिए नही है ? वोट के लिए नहीं होता  ....।वोट के लिए ..जालीदार टोपी लगा लेता है ...तिलक भी लगा लेता है...तराजू भी  तौल लेता है ...तलवार वालों को जूते भी मार देता है । क्या  वर्षों से तू अपने आप को नहीं छल रहा है ?  उठ ! छोड़  यह पार्टी ..तेरी दाल अब तक नहीं गली तो आगे भी नहीं गलेगी। हाशिये पर आ गया है तू ।  पार्टी का झंडा अपनी साईकिल पर लगाए कब तक चलेगा ।कब तक पार्टी अधिवेशन में जाजिम बिछायेगा...दरी उठायेगा ..पानी पिलायेगा ,,,खाली पेट सेवा करता रहेगा ।जब  फल मिलने का समय आता है तो  हाइ-कमान ’बाहर’ से भेज देता है किसी ग़ैर को पार्टी की सेवा करने का और तू ठगा ठ्गा सा रह जाता है ।उतिष्ठ मूढ़ ! उतिष्ठ ! छोड़  यह पार्टी ...यहीं सड़ेगा क्या....

अब उनकी अन्तरात्मा जग चुकी हैअब सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा  है । आत्मा निर्मल हो चुकी है । पुरानी पार्टी में छिद्र ही छिद्र था । कितनी मैली-कुचैली थी पुरानी पार्टी -कितनी दुर्गन्ध भर गई है वहां । कैसे रहा इतने दिन तक इस सड़न्ध में  कि जानवर भी न रहे ।कितनी संवेदनहीन थे वे लोग ...मेरे खून को खून न समझ सके....मेरे पसीने को पसीना न समझा । हाई कमान से मिलने का समय माँगो तो समय नहीं मिलता राजकुमार जी से मिलने का  तो सवाल ही नहीं। घुटन थी उधर .......अपने नेतॄत्व तो करते नहीं ...हमें करने नहीं देते ....बस जाजिम बिछाते रहो,,,दरी उठाते रहो...पानी पिलाते रहो...

 अटकले लगती है ।खबर चलती है ,नाटक चलता है ।नहीं नहीं... मैं  नहीं जा रहा हूँ ...मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ ....सब मीडिया की साजिश है,,,,मैं तो पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं ....पार्टी जो दायित्व सौपेंगी निष्ठा के साथ निभाऊँगा...मुझे मुख्यमंत्री बनने की  कोई इच्छा नहीं ...मैं तो पार्टी की सेवा के लिए पैदा हुआ हूँ ..वफ़ादार सेवक हूँ ....पार्टी की ऐसे ही सेवा करते करते मर जाऊँगा ...मेरी हर एक साँस देश के लिए है... पार्टी के लिए है...गरीबों के लिए है ..दलितों के लिए हैं..मज़दूरों के लिए है ...किसानों के लिए  ......मै तो बस देश हित के लिए साँस धारण किए हुए हूं।

उनकी साँस तो जवाब नहीं देती हैं ,अनुशासन जवाब दे जाता है और एक दिन सुबह उठ कर किसी अधो वस्त्र की तरह विचारधारा बदल देते है  !’वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृहणाति नरोपराणि.....
और फिर अचानक , अलाना पार्टी का ’हाथ’ छोड ’फ़लाना’ पार्टी का ’फूल’ थाम लेते हैं  ......रात-ओ-रात विचारधारा बदल लेते हैं ..सोच बदल लेते है ... संस्कार बदल लेते है... स्वयं हित के लिए नहीं ..परिवार हित के लिए  ...कुर्सी के लिए ...सत्ता सुख के लिए.
चुनाव काल में ऐसे ’आया राम गया राम ’को  लालू जी ’मौसम वैज्ञानिक’ की संज्ञा देते है । वह ’राम’ समझदार है जो चुनाव काल में मौसम का ,हवा का रुख देख कर पाला बदल लेता  है।
कुर्सी में गुन बहुत है ,सदा राखियो ध्यान
उड़ो हवा के संग सदा ,यह मौसम विज्ञान
ये मौसम विज्ञान , ’विचार’ की ऐसी तैसी
अपने ’राम’ चले जिधर मिल जाए ’कुर्सी’

जनता को छकने-छकाने के बाद ,अन्तत: घोषणा हो गई -अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़ ’फ़लाना’ पार्टी में शामिल हो गए।
 मंच सजाए जाने लगे ,स्वागत की तैयारियां की जाने लगी ...माला फूल मँगाए जाने लगे... इत्र-फुलेल छिड़के जाने लगे ,...केवड़ा जल का छिड़काव जारी है  .हाथ में ’कमल’ का फूल थमाना है .....’अलाना सिंह’ कह चुके हैं कि पुरानी पार्टी में काफी दुर्गन्ध है ।अगर   पुरानी पार्टी से वह कोई ’दुर्गन्ध’ साथ लाते हैं  तो नई पार्टी में न फ़ैले। ।पुरानी पार्टी को ज़ोरदार झटका दिया है तो स्वागत भी ज़ोरदार होना चाहिए।
प्रेस कान्फ़्रेन्स में ’ए बिग कैच मछली " प्रस्तुत किया गया --देखो प्रेस वालों ... अन्य पार्टी वालों -क्या तीर मारा है मैने

पत्रकार -  अलाना सिंह जी ! आप ने नई पार्टी क्यूँ ’ज्वाईन’ की। क्या देखा  इस में  ऐसा कि रात-ओ-रात ...?
अलाना सिंह- ’  देखो भई ! मेरे रग रग में देश भक्ति कूट कूट कर भरी है। हम खानदानी ’देशभक्त हैं ...जिधर देश भक्ति उधर मैं....देश पहले है ,पार्टी बाद में ,विचारधारा उसके बाद में और मैं तो सबसे बाद में । मुझ से किसान भाईयों का दर्द देखा नहीं जा रहा था -जिन ग़रीब किसान भाईयों के हाथ में ’ सिंहासन ’ सौपना था,  आप ने ’’खाट’  सौंप दिया और वह भी ’झिलंगी’ --यह किसान भाईयों का ही नहीं बल्कि ’खाट" का भी अपमान है ।मुझ से यह अपमान देखा नहीं जा सका सो इधर चला आया।मेरे देश के जवान सीमा पर अपने प्राण न्योछावर कर रहे हैं... हमारी  बहने विधवा हो रही है  ..कलाईयां सूनी हो रही है  ...और कोई कहे कि ’खून’ की दलाली है ..मैं आहत हो गया...सो इधर चला आया....
पत्रकार - मगर यह बयान तो महीना भर पहले आया था...तब तो आप ने पार्टी नहीं छोड़ी
अलाना सिंह -- तो क्या हुआ ? जब समझ में आया तब छोड़ी ,..
पत्रकार - मगर आप के पुराने साथी तो कह रहे हैं कि आप ’दगाबाज’ है?
-ठीक ही कह रहे होंगे।दगाबाजी -का मतलब  उनसे ज़्यादा और कौन समझता होगा । जब वो साईकिल के पीछे पीछे दौड़ रहे थे और पीछे कैरियर पर बैठने की जगह नहीं मिली तो ’हाथ’ पर आकर बैठ गए तब दगाबाजी नहीं दिखी
लोग कहते हैं कि मैं हाशिए पर आ गया था । भईए ! पार्टी का सच्चा सिपाही तो हाशिए पर ही रहता है ....पार्टी के मुख्य में तो जुगाड़ी  ...दरबारी...चमचे ..चरणस्पर्शी ...दण्डवती ..रहते है --उन्होने एक दीर्घ उच्छवास छोड़ते हुए अपना दर्द उडेला ।

तमाम उम्र  कटी पार्टी की सेवा करते 
आखिरी वक़्त में क्या खाक ’जुगाड़ी’ बनते 

-अलाना भईया की जय ...फलाना पार्टी की जय ...जिन्दाबाद ..जिन्दाबाद ...भईया जी संघर्ष करो....हम तुम्हारे साथ हैं--वन्दे मातरम -समर्थको ने नारा लगाया

अलाना सिंह  मुस्करा दिए--डूबते को तिनके का सहा्रा न सही ....तो ’कमल’ का डंठल ही सही।

अस्तु

-आनन्द.पाठक-
  

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